- बायो-मैथ्स साथ लेकर पढऩे से हुआ फिजिक्स स्ट्रांग, कुछ नंबर से चूकने पर भी नहीं हुआ निराश
- डॉक्टर बनने के अलावा नहीं था कोई आप्शन, निराशा में याद दिलाता था खुद से किया हुआ वादा
भिलाई(media saheb.com)|छत्तीसगढ़ के
जाने-माने शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्ञानेश मिश्रा को बचपन से ही बायो में काफी
इंटरेस्ट था। उनके पिता भी चाहते थे कि बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बनकर घर-परिवार के
साथ ही प्रदेश का नाम रोशन करे। इसलिए महज 9 वीं क्लास से ही उन्होंने मेडिकल प्रोफेशन के बारे में बताना
शुरू कर दिया था। 11 वीं क्लास में पहुंचते ही डॉ. मिश्रा ने बायो के
साथ मैथ्स लेकर पढ़ाई शुरू की। 12 वीं बोर्ड में अच्छे नंबर लाने के बावजूद मेडिकल
एंट्रेस में कुछ नंबरों से चूक गए। ऐसे में पैरेंट्स की सलाह से उन्होंने एक साल
ड्रॉप लेकर दोगुनी मेहनत की। अंतत: साल 1998 में ऑल इंडिया पीएमटी क्वालिफाई किया। डॉ. मिश्रा
ने बताया कि उस वक्त सीट कम और कॉम्पिटिशन बहुत ज्यादा था। सुविधाएं भी काफी सीमित
थी। बायो विषय में डॉक्टर और नर्स के अलावा किसी तीसरे ऑप्शन के बारे में स्टूडेंट
सोचता भी नहीं था और न ही स्कोप था। ऐसे में मेडिकल कॉलेज की सीट मिलना मेरे लिए
किसी सपने से कम नहीं था। ऑल इंडिया पीएमटी के चलते तंजौर तमिलनाडु के मेडिकल
कॉलेज से मैंने एमबीबीएस की पढ़ाई की उसके बाद कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। साल 2005 में पीजी करने के
बाद शिशु रोग विशेषज्ञ बनकर अपने ही शहर भिलाई में सेवा दे रहा हूं। साथ ही
शंकराचार्य मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर डॉक्टरों की नई पीढ़ी को
तैयार करने में जुटा हूं। डॉ. मिश्रा का मानना है कि कड़ी मेहनत का कोई दूसरा
विकल्प नहीं है। इसलिए खुद के सपनों को पंख देने के लिए आपको दिन रात एक तो करना
ही पड़ेगा, वर्ना सपना टूटने का डर सताता रहेगा।
बायो के साथ मैथ्स की पढ़ाई से फिजिक्स हुआ स्ट्रांग
डॉ. मिश्रा ने बताया कि उन्होंने बीएसपी सेक्टर 10 स्कूल से अपनी
स्कूलिंग पूरी की। 90 के दौर में खुद को कॉम्पिटिशन में बनाए रखने के
लिए 11 वीं में बायो-मैथ्स साथ लेकर पढ़ाई की। मैथ्स पढऩे के कारण
फिजिक्स काफी हद तक स्ट्रांग हो गया था। मेडिकल एंट्रेस में फिजिक्स एक ऐसा
सब्जेक्ट होता है जिसमें अगर आपने अच्छा स्कोर किया तो सलेक्शन की संभावना भी बढ़
जाती है। ड्रॉप का चलन 90 के दशक में बहुत कम हुआ करता था। उस वक्त एक साल
घर में रहकर पढ़ाई करना थोड़ा कठिन रहा। क्योंकि लोगों के हजार तरह के सवाल होते
हैं और आप हर किसी को समझा नहीं सकते हैं। ऐसे समय में संयम बरतते हुए सिर्फ अपने
पढ़ाई के लिए फोकस रहा। जब कभी थोड़ी निराश होती तो खुद को याद दिलाता था कि किस
लक्ष्य को लेकर मैंने खुद को मौका दिया है।
फैमिली जैसा मिला सचदेवा में माहौल
डॉ. मिश्रा ने बताया कि 90 के दशक में कोचिंग के लिए भी बहुत कम संस्थान ही
उपलब्ध थे। उस वक्त सचदेवा का काफी नाम था। इसलिए मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए
सचदेवा कॉलेज भिलाई को चुना। कोचिंग के फैडली और मोटिवेशनल माहौल ने निराशा को भी
आशा की किरण में तब्दील कर दिया। यहां के टीचर्स पढ़ाई और स्टूडेंट के लिए आज भी
इतने डेडिकेट हैं कि आप रात में 12 बजे फोन करके भी उनसे डाउट क्लीयर कर सकते हैं।
सबसे अच्छी बात ये है कि यहां हर सब्जेक्ट की तैयारी बेसिक से कराई जाती है।
टीचर्स पढ़ाने के साथ नोट्स बनवाते हैं। सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर का
चेहरा देखकर ही मैं मोटिवेट हो जाता था। वो हमेशा काउंसलिंग क्लास में कहते थे
ज्ञानेश तुम कर सकते हो। उनका विश्वास देखकर दोगुनी ऊर्जा आ जाती थी। पढ़ाई के साथ
मोटिवेशन बहुत जरूरी है। कई बार स्टूडेंट शुरूआत बहुत अच्छी करते हैं लेकिन आखिरी
वक्त में गड़बड़ा जाते हैं। ऐसे में अगर सबसे ज्यादा किसी चीज की जरूरत महसूस होती
है तो वो है मोटिवेशन जो हमें सचदेवा में भरपूर मिला और आज भी हर स्टूडेंट्स को
मिलता है।
एग्जाम में क्या होगा से सोचकर पढऩा न छोड़े
नीट की तैयारी कर स्टूडेंट्स से यही कहना चाहूंगा कि रिजल्ट के
बारे में एग्जाम से पहले न सोचे। ये मुश्किल जरूर है लेकिन अगर आपने ऐसा कर लिया
तो आधा जंग जीत जाते हैं। अपनी मेहनत पर भरोसा रखें कि खुद को भरोसा दिलाए कि
सबकुछ अच्छा होगा। हमेशा पॉजिटिव रहे। कोचिंग के हर टेस्ट को गंभीरता से लें।
क्योंकि ये छोटे-छोटे टेस्ट ही हमारी तैयारियों को परखने का सबसे अच्छा जरिया होता
है। कभी भी गिवअप न करे।(the states. news)

