- डॉक्टर कैसे काम करते हैं ये दिखाने पिता 80 किमी. दूर अस्पताल ले जाते थे
- पांच साल ड्रॉप लेकर भी नहीं हारी हिम्मत, आज रायगढ़ जिले के पिछड़े इलाके में कर रहे गरीबों का इलाज
भिलाई. (mediasaheb.com)रायगढ़ जिले के गांव के स्कूल में पढ़कर डॉ. आनंद कुमार दास आज उन्हीं ग्रामीणों की डॉक्टर बनकर सेवा कर रहे जिनके बीच कभी उनका बचपन गुजरा था। ज्यादातर लोग डॉक्टरी की पढ़ाई करके बड़े शहरों का रूख करते हैं लेकिन डॉ. आनंद अपने लोगों के बीच रहकर उनकी स्थिति सुधारना चाहते हैं। इसलिए रूरल पोस्टिंग मिलते ही रायगढ़ जिले के ऐसी जगह को चुना जो स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से बेहद पिछड़ा हुआ है। आदिवासी जनसंख्या बाहुल्य कापू में लोगों को डॉक्टर मरने के बाद नसीब होता है। जब से डॉक्टर आनंद की यहां पोस्टिंग हुई है आदिवासी हर मर्ज का इलाज करवाने अस्पताल आते हैं। डॉक्टर आनंद ने बताया कि बड़ा होकर डॉक्टर बनना है ये उनके पिता ने उनका जन्म होते ही तय कर लिया था। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बॉर्डर में पढऩे वाले सांकरा गांव के रहने वाले पिता पेशे से टीचर हैं। पिता अपनी गर्भवती पत्नी का प्रसव करवाने कई अस्पताल में भटके अंतत: ओडिशा के मेडिकल कॉलेज में किसी तरह उनका सिजेरियन प्रसव हुआ। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली देखकर पिता ने कहा बड़ा बेटा डॉक्टर बनेगा और छोटा बेटा कलेक्टर। पिता के सपने को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर मैं भी आगे बढ़ता गया। मेरी जिज्ञासा को शांत करवाने पिता अक्सर गांव से 80 किमी. दूर अस्पताल और मेडिकल कॉलेज मुझे घुमाने के लिए ले जाते थे। 12 वीं बोर्ड के बाद मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू की तो ये सपना लगातार मिल रही असफलताओं के कारण धूमिल होने लगा था। लगातार चार साल ड्रॉप लेकर भी जब मेडिकल एंट्रेस में चयन नहीं हुआ तो पिता ने एक आखिरी कोशिश की हिम्मत दी। वही जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट भी बना। आज उसी आखिरी कोशिश की वजह से मैं डॉक्टर बन पाया।
सीजी बोर्ड का स्टूडेंट था अचानक हो गया पैटर्न चेंज
डॉ. आनंद ने बताया कि वे गांव के स्कूल में पढ़े। हिंदी मीडियम और सीजी बोर्ड का स्टूडेंट था। जब मेडिकल एंट्रेस की तैयारी भिलाई में शुरू की तो यहां के माहौल में ढलने में लगभग एक साल गुजर गया। पहले साल चिकन पॉक्स के कारण एग्जाम भी नहीं दे पाया। जब दूसरे साल पैटर्न को समझकर पढऩा शुरू किया तब पीएमटी का पेपर लीक हो गया। दूसरा साल भी ऐसे ही निकल गया। ड्रॉप के तीसरे साल में रैंक थोड़ा एंपू्रव हुआ। चौथे साल में अचानक सिलेबस और पैटर्न चेंज हो गया। सरकार ने एआईपीएमटी और नीट दो अलग-अलग पैटर्न पर एग्जाम लेने का फैसला किया। मैं ठहरा हिंदी मीडियम स्टूडेंट ऐसे में सीबीएसई बोर्ड के सिलेबस को पढऩा अपने आप में बड़ा चैलेंज था। किसी तरह तैयारी की लेकिन चौथे साल में भी सलेक्शन नहीं हुआ। इसी बीच पिता की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों को देखकर मैंने बीएएमएस में एडमिशन ले लिया। साथ-साथ मेडिकल एंट्रेस की तैयारी में भी जुटा रहा। पांचवे ड्रॉप में साल 2014 में फाइनली ऑल इंडिया पीएमटी क्वालिफाई किया। जब पहली बार बिलासपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो पिता ने कहा अब कभी जीवन में पीछे मुड़कर मत देखना।
सचेदवा में पढ़कर पहुंचा मंजिल तक
डॉ. आनंद ने बताया कि 12 वीं बोर्ड के बाद उनके पिता ने भिलाई जाकर सचदेवा कोचिंग के बारे में पता किया था। पिता चाहते थे कि बेटा छत्तीसगढ़ के बेस्ट कोचिंग से मेडिकल एंट्रेस की तैयारी करे इसलिए वे खुद पहले भिलाई आकर कई कोचिंग सेंटर में घूमे। अंत में सचदेवा को सलेक्ट किया। जब मैं पहली बार सचदेवा में पढऩे के लिए आया तो यहां का कॉम्पिटेटिव माहौल देखकर घबरा गया था। शहर के बच्चे हम गांव के बच्चों से कई कदम आगे थे। यहां सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर ने ऐसी काउंसलिंग की कि दोबारा कभी मन हीन भावना से ग्रसित नहीं हुआ। उन्होंने कहा सफलता मीडियम नहीं मेहनत देखती है। वही क्वालिफाई होता है जो कड़ी मेहनत करता है। उनकी बातों को गांठ बांधकर मैं कड़ी मेहनत में जुट गया। शुरूआत में बेसिक कमजोर होने के कारण क्लास में काफी पीछे रहता था। सचदेवा के टीचर्स के नोट्स और पढ़ाई को इजी ट्रिक्स से करवाने के कारण लगातार बेहतर करता चला गया। हर क्लास में टीचर्स हमें आगे बढऩे के लिए मोटिवेट करते थे।
खुले मन से करनी है तैयारी
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से यही कहना चाहूंगा कि आप खुले से मन से तैयारी कीजिए। इस बात को मन से निकाल दीजिए कि मेरा सलेक्शन होगा कि नहीं। रिजल्ट के बारे में सोचेंगे तो पढ़ाई में मन नहीं लगा पाएंगे। ड्रॉप बढऩे के साथ टेंशन और डिप्रेशन बढ़ता जाता है लेकिन अगर आपने तय कर लिया है तो दुनिया की बातों को अनसुना करिए। सेल्फ मोटिवेशन आपको हर दिन आगे बढ़ाएगा। अपने आप पर भरोसा रखिए यही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।

