विनोद श्रीवास्तव
इंदौर।(mediasaheb.com) देश के जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चल रही है, वहां कुछ तो ऐसा हो रहा है जिसका अंदाजा हाईकमान को अगले विधानसभा चुनाव से पहले लग गया है कि यदि यही स्थिति रही तो राज्य में पुनः सत्ता पाना एक बड़ी चुनौती होगी। इसी को देखते हुए उच्च स्तर पर ताबड़तोड़ निर्णय लेकर तीन राज्यों के मुख्यमंत्री को तत्काल प्रभाव से बदल दिया गया और तीनों जगह बिल्कुल नए चेहरे को कमान देकर यह जताने की कोशिश की गई कि नेतृत्व परिवर्तन बहुत ही सामान्य प्रक्रिया है।
लेकिन पिछले साल हरियाणा, झारखंड और कई अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद ही यह अंदाजा लग गया था कि लोकसभा का वोट प्रतिशत विधानसभा चुनाव में बरकरार नहीं रह पा रहा है और आगामी विधानसभा चुनावों में भी यही हो सकता है, इसी कारण भाजपा नेतृत्व ने अलग-अलग राज्यों की समीक्षा कर जरूरत पड़ने पर नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति बनाई थी।
इसी के तहत उत्तराखंड, कर्नाटक के बाद अब गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को इस्तीफा देना पड़ा। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि यही फार्मूला चरणबद्ध तरीके से हरियाणा, त्रिपुरा और मध्यप्रदेश में भी आजमाया जाएगा।
हालांकि उत्तरप्रदेश को अपवाद स्वरुप छोड़ दिया गया है। इसके साथ ही जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है, वहां संगठन में बदलाव किया जाएगा। दरअसल पार्टी के रणनीतिकारों को लगता है कि बीते कुछ सालों में राज्यों में एक ऐसा मतदाता वर्ग तैयार हुआ है जो लोकसभा चुनाव में तो मोदी के नाम पर वोट करता है, मगर विधानसभा चुनाव में स्थानीय नेतृत्व को सामने रख कर वोट देता है। ऐसे में राज्यों में जनाधार और जातीय समीकरण में फिट रहने वाले नेताओं की जरूरत है।
भाजपा को पिछले साल तब बढ़ी जब विधानसभा चुनाव में पार्टी को झारखंड और महाराष्ट्र में सत्ता गंवानी पड़ी।
वहीं हरियाणा में पार्टी को सरकार बनाने के लिए जेजेपी की मदद लेनी पड़ी। इसके बाद इसी साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजय ने पार्टी की चिंता बढ़ा दी। असम को छोड़कर किसी राज्य में पार्टी लोकसभा चुनाव के दौरान हासिल मत प्रतिशत को बरकरार नहीं रख पाई। हालांकि हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के नतीजों के बाद ही नेतृत्व ने राज्यवार समीक्षा कर नेतृत्व परिवर्तन करना तय कर लिया था। लेकिन जब पश्चिम बंगाल से निराशाजनक परिणाम आए तब पार्टी ने गंभीरता से निर्णय लिया। इस क्रम में पहले उत्तराखंड, फिर कर्नाटक और अब गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन किया गया। कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश में भी इसके प्रयास किए गए थे लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी ताकत दिखाकर हाईकमान को ठंडा कर दिया।
अब देखना यह है कि क्या मध्यप्रदेश में भी इसका असर होगा क्योंकि कहीं न कहीं आलाकमान के पास यह खबर तो पहुंच ही चुकी है कि पिछले कोरोना संकट के समय प्रदेश सरकार के निर्णय लेने की लेटलतीफी के कारण कई लोगों की मौत हो गई थी। जिससे आम लोगों में सरकार की छवि खराब हुई है, वहीं इन दिनों प्रदेश में अपराधों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ रहा है इससे चिंतित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रुप से प्रदेश के बड़े शहरों के पुलिस अधिकारियों को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यदि अपराधों पर नियंत्रण नहीं कर पाएंगे तो ट्रांसफर के लिए तैयार रहें।
इससे परे राजनीतिक लिहाज से देखें तो भी कई समीकरण बनते नजर आ रहे हैं खासकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के मालवा निमाड़ में सक्रिय होने के बाद से, वहीं प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा भी हौले -हौले संगठन को अपने हिसाब से मजबूत कर रहे हैं। हालांकि ये दोनों नेता शिवराज के प्रति अपना समर्थन सार्वजनिक रुप से भी कई बार जाहिर कर चुके है, पर गुजरात के निर्णय ने इन तीनों को चिंता में जरुर डाल दिया है। इन नेताओं से इतर भी प्रदेश में भाजपा के कई वरिष्ठ नेता जिनमें नरेंद्र सिंह तोमर, उमा भारती, प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा शामिल है, जो समय-समय पर अपनी उपस्थिति का अहसास आलाकमान को कराते रहते हैं लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सोच इससे अलग है और जगजाहिर है कि मोदी और शाह की जोड़ी कुछ अलग ही करने में विश्वास रखती है यहीं कारण है कि सब कुछ सामान्य दिखाई देते हुए भी कहीं न कहीं असमंजस जरुर बना हुआ है और यह आने वाला समय ही बताएगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा।
यह अलग बात है कि प्रदेश के कई नेता अपने आपमें भूपेंद्र पटेल का चेहरा देखने लगे है पता नहीं कब किस्मत का सितारा बुलंद हो जाए और वे आम से खास हो जाएं।

