किसान पिता को नहीं पता था बेटा किस चीज की पढ़ाई कर रहा
मन में सोच लिया था या तो डॉक्टर बनूंगा या फिर मजदूर, इसलिए चार साल तक पढ़ता चला गया
भिलाई. (mediasaheb.com)स्कूल की पढ़ाई के साथ गांव के डॉक्टर के साथ कंपाउंडरी करने वाला लड़का आज खुद एक एमबीबीएस डॉक्टर बन गया है। गरीबी में कभी भाई की जगह कंपाउंडर की नौकरी करने वाले फत्तेलाल को लगता कि जिंदगी भर मजदूरी करने से बेहतर है अच्छे से पढ़ाई करके मैं खुद डॉक्टर बन जाऊं। इसलिए 12 वीं बोर्ड देते ही रायपुर जिले के चटौध गांव के रहने वालेडॉ. फत्तेलाल निषाद ने तैयारी शुरू कर दी।
ग्रामीण परिवेश और खराब आर्थिक स्थिति के चलते शुरुआत में उन्हें न ठीक से गाइडेंस मिला और न ही सही जगह पढऩे का मौका। इसलिए ड्रॉप का पहला साल किताबों के साथ जंग लड़ते हुए बीत गया। पहली बार जब मेडिकल एंट्रेस दिया तो रैंक तो छोड़ ही दीजिए सब्जेक्ट में इतने कम नंबर आए कि उन्हें खुद के रिजल्ट पर यकीन नहीं हुआ। ऐसे में उन्होंने संकल्प लिया कि किसी भी हाल में वे मेडिकल एंटे्रस क्वालीफाई करके रहेंगे। समय के साथ एक के बाद एक मिलती असफलता उनके हौसले को तोड़ रही थी। कहते हैं जहां चाह है वहां राह भी है।
आखिरकार साल 2014 में एक बार फिर कोशिश की और अंतत: नीट क्वालिफाई करके बिलासपुर मेडिकल कॉलेज पहुंच गए। नक्सल प्रभावित बस्तर के भानपुरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ डॉ. फत्तेलाल निषाद कहते हैं सपना चाहे छोटा हो या बड़ा उसे पूरा करने की चाहत बड़ी होनी चाहिए। मैं हर बार हारता लेकिन खुद को याद भी दिलाता कि किन परिस्थितियों में बचपन गुजरा है। इसलिए भविष्य को बेहतर बनाने मेहनत करता।
बायो और कैमेस्ट्री में होती थी बहुत दिक्कत
गांव के सरकारी स्कूल में पढ़कर डॉक्टर बनने वाले डॉ. फत्तेलाल ने बताया कि उन्हें बायो और कैमेस्ट्री में बहुत दिक्कत होती थी। शुरूआत में बायो से मैं हर रोज कुश्ती लड़ता था। यही हाल कैमेस्ट्री का भी था पर मैंने हार नहीं मानी। इन दोनों विषयों को ज्यादा समय देकर पढऩे लगा। कोचिंग में भी पहले छह महीने तो ये समझने में बीत गया कि एग्जाम का पैटर्न कैसा है। इसे किस तरह से साल्व करना है। मैं जिस बैकग्राउंड से आया था वहां ड्रॉप का चलन नहीं था। ऐसे में सफल होने का प्रेशर भी काफी ज्यादा था। घर वाले कहते थे कि अगर नहीं हो रहा तो कुछ दूसरा पढ़ लो। साल खराब मत करो।
सचदेवा के टेस्ट सीरिज से मिला कॉन्फिडेंस
डॉ. फत्तेलाल ने बताया कि शहर के इंग्लिश मीडियम में पढऩे वाले बच्चों के साथ पढ़ते वक्त काफी घबराहट होती थी। कोचिंग में भी कॉन्फिडेंस नहीं आ पाता था। धीरे-धीरे टेस्ट सीरिज में परफार्मेंस सुधरता गया वैसे-वैसे आत्मविश्वास भी बढ़ता गया। नीट की तैयारी के दौरान चार साल के ड्रॉप में अगर किसी ने सबसे ज्यादा हौसला बढ़ाया तो है सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर। वो हमेशा कहते थे कि जब तक आप दर्द नहीं सहोगे तब तक जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होगा। उनकी बातें सुनकर ही मैं पूरी तरह चार्ज हो जाता था। सचदेवा के टीचर्स तो अपने आप में लाजवाब हैं। वो हर स्टूडेंट को एक समान मानकर उन पर फोकस करते हैं। यहां का पॉजिटिव माहौल पढऩे के लिए बहुत अच्छा है। एक छत के नीचे सारे विषयों की एक साथ तैयारी हो जाती है। बीएएमएस ज्वाइन करने के बाद भी टीचर्स का मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा।
हार्ड वर्क का कोई विकल्प नहीं
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट से यही कहना चाहूंगा कि हार्ड वर्क का कोई विकल्प नहीं है। अगर आपने मन लगाकर मेहनत की है तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर मैं चार साल ड्रॉप लेकर भी एमबीबीएस की सीट हासिल कर सकता हूं तो आप क्यों नहीं। एक बार सलेक्शन हो जाने के बाद लोगों का नजरिया अपने आप बदल जाता है। इसलिए निराशा को कभी खुद पर हावी होने मत दीजिए। संघर्ष करते रहने से ही सक्सेस मिलती है।

