रायपुर, (mediasaheb.com)छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने के लिए जो कदम उठाए हैं, वो मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। अब तक सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वालों में एक बड़ा वर्ग निचले तबके का रहा है। मध्यम वर्ग अपने बच्चों को मजबूरी में ही सरकारी स्कूलों में भेजता था। इसका एक कारण यह था कि निजी स्कूलों में माहौल के साथ अंग्रेजी में शिक्षा लेने का अवसर था। भले ही लोग निजी स्कूलों को मोटी फीस देना मंजूर करते थे, मगर सरकारी स्कूलों की ओर देखते भी नहीं थे। पालकों की उपेक्षा के साथ राज्य सरकार भी सरकारी स्कूलों के प्रति उदासीन रही। यही उदासीनता सरकारी स्कूलों पर भारी पड़ी। एक जमाने के नामी- गिरामी सरकारी स्कूल हाशिये पर चले गए।
जिन स्कूलों में कभी दाखिले के लिए सिफारिश लगती थी, वहां इक्के- दुक्के बच्चे पढ़ने जाते रहे। बच्चों की संख्या कम होने की वजह से ही कई सरकारी स्कूलों का विलय कर दिया गया और एक ही छत के नीचे दो- तीन सरकारी स्कूलों की कक्षाएं लगती रहीं।
बघेल सरकार ने सबसे पहले अंग्रेजी माध्यम के सरकारी स्कूल खोलने का फैसला लिया और राजधानी में यह फैसला धरातल पर उतर चुका है। स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी स्कूल का भवन देखने में अब निजी स्कूलों को पीछे छोड़ रहा है।
रंगरोगन और सफाई व्यवस्था देख कर एकबारगी कोई नहीं कह सकता कि यह सरकारी स्कूल है। आंखें अब तक इस बनावट के निजी स्कूल देखने को अभ्यस्त है। इस स्कूल के खुलने के साथ ही बच्चों के साथ पालकों में भी सरकारी स्कूल के प्रति धारणा देर-सबेर बदलेगी। धारणा बदलते ही सरकारी स्कूलों के दिन फिर सकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि सरकारी अंग्रेजी स्कूलों के लिए शिक्षकों की व्यवस्था ठोक- बजा कर की जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि निजी स्कूलों की अपेक्षा सरकारी स्कूलों में अच्छे व प्रशिक्षित शिक्षक मिलेंगे।
निजी स्कूलों में कम वेतन के कारण प्रशिक्षित शिक्षक नहीं मिलते, इसकी कमी सरकारी स्कूलों में दूर हो जाएगी। अभी सरकार के सामने सरकारी अंग्रेजी स्कूलों का विस्तार ग्रामीण स्तर तक करने की बड़ी चुनौती है। अगर यह काम व्यवस्थित तरीके से कर लिया गया, तो सरकार की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन दिखेगा।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इससे एक कदम आगे जाकर हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों को भी उन्नत करने का फैसला किया है। जिस मॉडल के आधार पर अंग्रेजी स्कूल तैयार किए गए हैं,उसी आधार पर प्रदेश में हिंदी माध्यम के स्कूल भवनों को तैयार किया जाएगा। यह निर्णय हिंदी माध्यम के स्कूलों के हित में होगा। ऐसा होने से हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों को देख कर पालकों में विश्वास जागेगा और वे अपने बच्चों को वहां भेजने के लिए मानसिकता तैयार कर सकेंगे।
खास बात यह है कि स्कूलों में किताबें मुफ्त में दी जाती हैं और फीस भी बहुत कम रहती है। ऐसी स्थिति में पालकों को आर्थिक नजरिए से राहत मिलेगी। वैसे भी कोरोना काल में पालकों की आर्थिक स्थिति पर फर्क पड़ा है। कई लोगों का रोजगार छिन गया है या व्यवसाय में घाटा होने से आर्थिक कमजोरी आयी है। यही कारण है कि कोरोना काल में ज्यादातर पालक निजी स्कूलों की फीस अदा करने में असमर्थ रहे अथवा अपने बच्चों को निजी स्कूलों से हटा कर सरकारी स्कूलों में दाखिल कर दिया है।
इस परिस्थिति में बघेल सरकार का ताजा फैसला प्रासंगिक भी माना जा सकता है। अब नजर इसी बात पर रहेगी कि योजना का क्रियान्वयन किस तरह से किया जा रहा है। इसी आधार पर योजना जनता तक पहुंच पाएगी। ऐसा होने से निजी स्कूल अब मनमाने तरीके से फीस वसूलने से पहले साेचेंगे और मोटी फीस पर लगाम लग सकेगी। निजी स्कूलों पर नियंत्रण पर लगातार बात होती रही है, मगर अब तक कोई भी राज्य सरकार इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठा सका है। फीस आदि के लिए आयोग बनाया गया है, पर धरातल पर इसके नतीजे अब तक नहीं दिखे हैं।

