मिलिए डॉक्टर माला चौधरी से, जिन्होंने 9 कक्षा से शुरू कर दी मेडिकल एंट्रेस की तैयारी
भिलाई (mediasaheb.com) | मेहनत इतनी खामोशी से करो कि सफलता शोर मचा दे, इस बात को जीवन में अमल करने वाली डॉ. माला चौधरी आज उसी अस्पताल में सेवा दे रही जिस अस्पताल में उन्होंने जन्म लिया था। बचपन से डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली डॉ. माला ने बताया कि जब वो पिता के साथ पं. जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र सेक्टर 9 जाती थी तो वहां के डॉक्टरों को देखकर बड़ा खुश हो जाया करती थी। छोटे बच्चों के डॉक्टर बड़े ही खुशमिजाज तरीके से प्राब्लम पूछकर बच्चों को दर्द से राहत पहुंचाते थे। तब से मन में कहीं न कहीं ये चलने लगा था कि बड़ी होकर मैं भी डॉक्टर बनूंगी। इसलिए आठवीं कक्षा से ही मेडिकल एंट्रेस के बारे में पढऩे में लगी थी। हर साल जब गर्मियों की छुट्यिों में लोग घूमने जाते थे तो मैं इन दो महीनों में सिर्फ मेडिकल एंट्रेंस की किताबें पढ़ती थी ताकि 12 वीं बोर्ड के बाद सीधे मेडिकल कॉलेज पहुंच सकूं। सेल्फ स्टडी और कड़ी मेहनत के बल पर वो घड़ी आ ही गई जब साल 2000 में सीबीएसई पीएमटी क्वालिफाई किया। फाइनली सूरत के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया।
क्लास के किताबों के अलावा पढ़ती थी सी पीएमटी की पुस्तकें
डॉ. माला ने बताया कि उन्होंने बहुत छोटे क्लास से लक्ष्य निर्धारित कर लिया था। इसलिए 12 वीं बोर्ड एग्जाम तक लगभग आधे से ज्यादा मेडिकल एंट्रेस का सिलेबस घर पर ही रहकर पढ़ लिया था। चूंकि सपना ऑल इंडिया पीएमटी में सलेक्ट होने का था इसलिए उन्हें अच्छे मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए एक साल इंतजार करना पड़ा। मैं बचपन से पढं़तु टाइप बच्चों में शामिल थी, फ्रेंड सर्कल भी वैसा ही था इसलिए पढ़ाई से कभी ध्यान नहीं भटका। यही कारण है कि जो भी सोचा था वो आज सब सच हो गया। बीएसपी सेक्टर 9 हॉस्पिटल में जब पहली बार ज्वाइन किया तो वहां वही सीनियर डॉक्टर मेरी हेड बनकर मिली जो कभी बचपन में मेरा इलाज किया करती थी। उनके साथ रहकर डॉक्टरी पेशे की बारीकियों को समझने का मौका मिला।
क्रैश कोर्स ज्वाइन करके खुद को परखा
12 वीं बोर्ड से पहले मैंने खुद की तैयारियों को परखने के लिए सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज का क्रैश कोर्स ज्वाइन किया था। यहां जब टीचर्स पढ़ाते तो बाकी बच्चे उन सब्जेक्ट को पहली दफा पढ़ रहे होते लेकिन मैं रिविजन कर रही होती। इससे काफी लाभ मिला। मोटिवेश सेशन में सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर हमें मोटिवेट करते थे। वो कहा करते थे कि डॉक्टर आप खुद के लिए नहीं पूरे समाज के लिए बन रहे हो। इसमें आपका परिवार भी शामिल है। इसलिए सौ फीसदी देकर तैयारी करो। उनकी बातें एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती थी जो कॉम्पिटिशन में काफी काम भी आई।
लिखकर पढऩा सीखें
इस साल नीट की तैयारी कर रहे बच्चों से इतना कहना चाहूंगी कि हर चीज को लिखकर पढऩे की आदत डालें। लिखी हुई बातें दिमाग में छप जाती है उसे आप जल्दी भूल नहीं पाते। इसलिए छोटी सी छोटी जानकारी को भी नोटबुक में लिखकर रखें ताकि जरूरत पढऩे पर कभी भी उसे रिवाइस कर सको। एमबीबीएस के बाद मैंने एक साल दिल्ली में रहकर पीजी सीट के लिए कोचिंग की लेकिन असफलता हाथ लगी। उस वक्त मैं काफी निराश हो गई थी लेकिन खुद को अपना वादा याद दिलाते हुए नए सिरे से तैयारी की। आज जब छोटे-छोटे बच्चों का शिशुरोग बनकर इलाज करती हूं तो लगता है कि जीवन में जो होता है वो अच्छे के लिए होता है। अपने मरीज को ठीक होते देखने से बड़ा एक डॉक्टर के लिए दुनिया में कोई सुकून नहीं है। लोग बिना मांगे ही आपकी झोली दुआओं से भरकर चले जाते हैं।(the states. news)

