गांव से निकलकर शहर आया तो सबकुछ था नया, जीरो से शुरू की मेडिकल एंट्रेस की तैयारी
भिलाई(media saheb.com)| धुर नक्सल प्रभावित
बस्तर संभाग के सुकमा जिला चिकित्सालय में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवाएं दे रहे
डॉ. कमलेश बघेल को एक समय पर डॉक्टर बनने के लिए क्या-क्या परीक्षाएं देनी पड़ती
है ये भी नहीं पता था। अभनपुर से तीस किमी. दूर गोतियाडीह गांव से अपने सफर के
शुरुआत जब उन्होंने की तो पढ़ाई से लेकर माहौल तक सबकुछ उनके लिए नया था। सीजी
बोर्ड, हिंदी मीडियम स्टूडेंट के लिए सीबीएससी बोर्ड के स्टूडेंट्स को
टक्कर देना खुद में बड़ी चुनौती थी। इतने विपरीत परिस्थितियों के बाद भी डॉ. कमलेश
ने हार नहीं मानी और जीरो से पढ़ाई चालू करके साल 2014 में नीट क्लीयर किया। डॉ. कमलेश ने बताया
कि उन्हें सिर्फ इतना पता था कि जीवन में अगर कुछ बनना है तो सिर्फ डॉक्टर, इसलिए कभी किसी
दूसरे फील्ड की तरफ ध्यान ही नहीं गया। दो साल लगातार असफलता के बाद तीसरे ड्रॉप
में सलेक्शन हुआ तो पूरे परिवार ने गांवभर में मिठाई बांटी थी। अपने परिवार और
गांव का पहला डॉक्टर बनने का गौरवान्वित पल याद करके आज भी मैं सातवें आसमान में
चला जाता हूं। इस सफलता के लिए मेरे साथ परिवार ने भी संघर्ष किया। उनका भरोसा ही
था कि मैं अपने लक्ष्य से भटका नहीं।
रिश्तेदार और पड़ोसी मारते थे ताना, पूछते थे क्यों टाइम
वेस्ट करवा रहे
डॉ. कमलेश ने बताया कि जब एक के बाद एक लगातार दो सालों तक
असफलता मिली तो रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने ताना मारना चालू कर दिया था। परिवार
के लोगों से पूछते थे कि क्यों बेटे का टाइम वेस्ट करवा रहे हो। उस वक्त मैंने भी
लोगों से मिलना जुलना काफी हद तक कम कर दिया था। ऐसे समय में बड़े भैय्या और
सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर ने मोटिवेट किया। जैन सर ने
तो कई बार पर्सनल काउंसलिंग भी की। हर बार वो कहते थे कि तुम्हें दूसरों के नंबर
देखकर निराश होने की जरूरत नहीं है, बस अपने हिस्से की पढ़ाई ईमानदारी से करनी है। सचदेवा में तीन
साल कोचिंग के दौरान उन्होंने फैमिली की तरह सपोर्ट किया। 12 वीं बोर्ड के बाद जब
मैं कोचिंग करने सचदेवा पहुंचा था तब मुझे कुछ नहीं आता था। पहले साल पूरा सिलेबस
और पैटर्न समझने में निकला। लक्ष्य बड़ा था इसलिए मैंने जीरो से पढ़ाई चालू करना
ही बेहतर समझा।
सचदेवा के टीचर्स ने नहीं होने दिया एग्जाम प्रेशर हावी
ड्रॉप इयर में सचदेवा में पढ़ाई करने वाले डॉ. कमलेश ने बताया
कि पहले अटेम्प्ट में उन पर एग्जाम का प्रेशर काफी हावी हो गया था। टाइम मैनेजमेंट
भी ठीक से नहीं कर पाए थे। तब सचदेवा के टीचर्स ने पेपर साल्व करने का ऐसा तरीका
बताया कि दूसरे अटेम्प्ट में काफी हद तक प्रेशर गायब हो गया और रैंक भी इंप्रूव
हुआ। यहां के टीचर्स के बनवाए शॉर्ट नोट्स रिविजन के समय काफी मददगार साबित हुए।
शुरू-शुरू में टेस्ट सीरिज में रैंक बहुत पीछे आता था, तब जैन सर मोटिवेट
करते हुए कहते थे खरगोश को कछुआ कभी भी पीछे छोड़ सकता है। धैर्य के साथ और भी
ज्यादा मेहनत करो। गेस्ट सेशन में आने वाले सचदेवा के एक्स स्टूडेंट और डॉक्टरों
के संघर्ष को सुनकर देखकर आगे बढऩे की प्रेरणा मिलती थी।
रिवाइस, रिमाइंड और रिकॉल करना जरूरी
जो स्टूडेंट्स नीट की तैयारी कर रहे हैं उनको रिवाइस, रिमाइंड और रिकॉल इस
फॉर्मूले में पढ़ाई करना चाहिए। पहले चीजों को याद करो फिर दोबारा उसे रिमाइंड करो
और टेस्ट सीरिज या फिर पुराने पेपर साल्व करके रिकॉल करो। ऐसा करने से आपको अपनी
वीकनेस और कमी एग्जाम से पहले ही समझ आ जाएगी। समय रहते इसे सुधार लिया तो सफल
होने से कोई नहीं रोक सकता। लोगों की बातों को इग्नोर करना सीखें। जब आप सफल होकर
घर लौटेंगे तो यही लोग सबसे पहले बधाई देने आते हैं। (the
states. news)

