- किसान पिता बनना चाहते थे डॉक्टर, गरीबी में पढ़ाई छोड़कर संभालना पड़ा परिवार, अब बेटा बना गांव का पहला डॉक्टर
- अगर लक्ष्य निर्धारित कर लिया है तो कभी नहीं करना है गिवअप, पढि़ए कैसे चार साल ड्रॉप लेकर किया मेडिकल एंट्रेस क्वालिफाई
भिलाई(mediasaheb.com)| उड़ीसा बॉर्डर से लगे सराईपाली बसना के नवरंगपुर गांव में रहने वाले कमलेश की बचपन से एक ही चाहत थी किसी तरह बड़ा होकर डॉक्टर बन जाऊं। पर डॉक्टर कैसे बनते हैं पूरे गांव में ये बताना वाला कोई नहीं थी। किसान पिता भी कभी डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन घर की खराब आर्थिक स्थिति के कारण ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए। ऐसे में बेटा कमलेश पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए कठिन डगर पर चल पड़ा। 11 वीं में बायो लिया तब ये तो पता था कि डॉक्टर बनने के लिए बायो पढऩा पड़ता है। लेकिन कौन-कौन सी परीक्षाएं पड़ती है ये 12 वीं के बाद पता चला। दोस्तों और सीनियर्स की सलाह मानकर 12 वीं के बाद रायपुर आ गया पर यहां भी प्रॉपर गाइडलाइन के अभाव में भटकता रहा। अंत में किसी ने भिलाई में कोचिंग करने की सलाह दी। धीरे-धीरे सिलेबस को समझकर पढऩा शुरू किया। मेडिकल एंट्रेस सिर्फ पढ़ाई नहीं मांगती उसके लिए डेडिकेशन भी जरूरी होता है। यही कारण था कि एक के बाद एक फेल्यिर हाथ लगा। लगातार तीन साल तक फेल होने के कारण मन में निराशा हावी हो गई थी बावजूद अपने डॉक्टर बनने के लिए लक्ष्य को छोडऩा नहीं चाहता था। इसलिए वेटरनरी कॉलेज ज्वाइन करके चौथे साल एक बार फिर कोशिश की। साल 2014 में नीट क्वालिफाई कर ही लिया। जब पहली बार बिलासपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो किसान पिता खुशी से झूम उठे। उन्होंने बेटे को गांव का पहला डॉक्टर बनने की खुशी में हर घर में मिठाईयां बांटी थी। गरियाबंद जिले के सरकारी अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा दे रहे डॉ. कमलेश पटेल कहते हैं कि अगर लक्ष्य निर्धारित कर लिया है तो कभी गिवअप नहीं करना। ये लक्ष्य ही आपको जीवन में आगे बढ़ाता है।
फिजिक्स, कैमेस्ट्री सब थी अबूझ पहेली
डॉ. कमलेश ने बताया कि उनकी स्कूलिंग गांव से हुई है। ऐसे में जब मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू की तो फिजिक्स, कैमेस्ट्री भी किसी पहेली से कम नहीं लगती थी। ऊपर से भिलाई के माहौल में ढलना और यहां के बच्चों से कॉम्पिटिशन करना भी बड़ा चैलेज रहा। कोचिंग के पहले साल सबकुछ ऊपर से जाता था। कई बार रात में निराश होकर घंटों रोता कि आखिर कैसे मैं पढ़ाई करूं। दूसरे ही पल पिता का चेहरा आंखों के सामने आ जाता फिर खुद को मनाकर किताबों की दुनिया में कहीं खो जाता था। घर की आर्थिक स्थिति भी खराब थी। इसलिए पिता पर अपनी पढ़ाई और ड्रॉप का बोझ भी नहीं बढ़ाना चाहता था। ऐसे में हर रोज खुद से कहता था कि मुझे हार नहीं मानना है। जब साथ पढऩे वाले दोस्तों का सलेक्शन हो गया और मैं बच गया तो काफी टूट गया, तब सचदेवा के टीचर्स ने काउंसलिंग करके दोबारा मेहनत करने के लिए मोटिवेट किया।
एक ही छत के नीचे सभी विषयों की पढ़ाई, सचदेवा को बनाती है खास
डॉ. कमलेश ने बताया कि शुरूआत में उन्हें हर विषय की पढ़ाई के लिए अलग-अलग जगह जाना पड़ता था। ऐसे में पूरा दिन दौड़ते-भागते निकल जाता। सचदेवा भिलाई ज्वाइन किया तो यहां सभी विषयों की एक ही छत के नीचे पढ़ाई होने लगी। इससे टाइम भी बच जाता और पैटर्न को समझने में भी मदद मिल जाती थी। साथ ही टीचर्स भी इतने फ्रेंडली हैं कि उनसे सवाल पूछने में झिझक भी नहीं होती थी। टीचर्स भी ये जल्दी समझ जाते कि कौन से बच्चे को किस विषय में ज्यादा दिक्कत हो रही है। जिसका लाभ स्टूडेंट्स को यहां मिलता है। सचदेवा के टेस्ट सीरिज और डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की काउंसलिंग क्लास इस पूरे कोचिंग को अपने आप में खास बना देती है। स्टार ऑफ द वीक में टेस्ट सीरिज के नतीजों की घोषणा करते हुए टॉप करने वाले बच्चों को मंच पर बुलाया जाता था। साथ ही एक्स स्टूडेंट जो डॉक्टर बन चुके हैं वो अपनी जर्नी हमें बताते थे। ये सब एक पॉजिटिव एनर्जी का संचार करता था। फाइनेशियल इश्यु में जैन सर ने मेरी काफी मदद भी की।
बार–बार नोट्स नहीं बदलना चाहिए
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से यही कहना चाहता हूं कि स्टूडेंट्स को बार-बार कोचिंग और नोट्स नहीं बदलना चाहिए। बार-बार इंस्टीट्यूट बदलने से टीचर्स और स्टूडेंट्स के बीच का तालमेल खराब होता है। साथ ही नोट्स बदलने से कन्फ्यूजन भी होता है। इसलिए एक नोट्स को फॉलो करते हुए उसी से पढ़ाई करना चाहिए। रिविजन सबसे जरूरी है। आप चाहे कितना भी पढ़ लें अगर रिविजन नहीं किया तो सारी मेहनत बेकार चली जाती है।For English News : the states.news

