जयपुर.
राजस्थान निकाय चुनाव में इस बार बीजेपी और कांग्रेस के सामने मुकाबला सिर्फ एक-दूशरे से नहीं है. दोनों पार्टियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनके अपने खुद के ही लोग बन गए हैं. टिकट नहीं मिलने से नाराज दावेदारों ने बड़ी संख्या में निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया है और अब मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हैं. कुल मिलाकर देखें तो ये दोनों पार्टियों के बीच ऐसे लोग हैं जो ये समझने में मुश्किल हालात बना रहे कि कौन जीत दर्ज कर सकता है.
आंकड़ों और पार्टी पदाधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेशभर में मोटे तौर पर बीजेपी के करीब 9 हजार और कांग्रेस के 8 हजार से ज्यादा बागी चुनाव मैदान में हैं. दोनों पार्टियों के पास अभी सभी निकायों का पूरा आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन आंकड़ों को मोटा अनुमान माना जा रहा है. लेकिन संख्या से ज्यादा चिंता इस बात की है कि इन बागियों में केवल सामान्य दावेदार ही नहीं हैं. कई पुराने पार्टी पदाधिकारी, पूर्व जनप्रतिनिधि, पूर्व पार्षद और स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ रखने वाले नेता भी अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ मैदान में उतर गए हैं. यही वजह है कि टिकट वितरण के बाद अब दोनों दलों की पूरी रणनीति बदलती दिखाई दे रही है. पहले टिकट देने की लड़ाई थी, अब टिकट बचाने के बाद वोट बचाने की लड़ाई शुरू हो गई है
किन इलाकों में सबसे ज्यादा बागी
पार्टी बागियों की अनुमानित संख्या सबसे ज्यादा चर्चा वाले इलाके
बीजेपी करीब 9 हजार श्रीगंगानगर, बालोतरा, निम्बाहेड़ा, कोटपूतली, जैसलमेर
कांग्रेस 8 हजार से ज्यादा बालोतरा, जैसलमेर, बाड़मेर, टपूतली, सीसवाली, कुचेरा, झालरापाटन
यहां सबसे अहम बात यह है कि यह पूरे प्रदेश का मोटा अनुमान है. दोनों पार्टियों के पास अभी हर निकाय का पूरा आंकड़ा नहीं है. इसलिए इसे अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता
बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द श्रीगंगानगर
बीजेपी की बगावत में श्रीगंगानगर सबसे ऊपर दिखाई दे रहा है. यहां नगर परिषद में 70 बागी मैदान में हैं. यह संख्या अपने आप में बताती है कि टिकट वितरण के बाद पार्टी के अंदर असंतोष किस स्तर तक पहुंचा है. इसके बाद बालोतरा में 57, निम्बाहेड़ा में 37, कोटपूतली में 35, जैसलमेर में 30 और पदमपुर में 25 बागी चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा बाड़मेर में 23, बारां में 22, सीसवाली में 24 और भीलवाड़ा में 21 बागियों ने बीजेपी के अधिकृत प्रत्याशियों के सामने चुनौती खड़ी कर दी है. बीकानेर नगर निगम में 15, सादुलशहर में 17 और श्रीविजयनगर में 12 बागी मैदान में हैं.
बीजेपी के प्रमुख बागी आंकड़े
निकाय बीजेपी के बागी
श्रीगंगानगर 70
बालोतरा 57
निम्बाहेड़ा 37
कोटपूतली 35
जैसलमेर 30
पदमपुर 25
सीसवाली 24
बाड़मेर 23
बारां 22
भीलवाड़ा 21
सादुलशहर 17
बीकानेर 15
श्रीविजयनगर 12
बीजेपी में सिर्फ दावेदार नहीं, बड़े नाम भी मैदान में
बीजेपी की परेशानी इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि कई जगह बगावत करने वालों की स्थानीय पहचान मजबूत है. डीग में बीजेपी के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश कौशिक निर्दलीय मैदान में हैं. बूंदी में नेता प्रतिपक्ष मुकेश माधवानी ने भी मोर्चा खोल दिया है. सादड़ी में पूर्व पालिकाध्यक्ष दिलीप सोनी, पूर्व पालिका उपाध्यक्ष घीसाराम जाट और बीजेपी युवा मोर्चा अध्यक्ष नारायण राइका निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. राजसमंद में पूर्व पार्षद गोवर्धन लड्ढा, सुरेश माली और हिम्मत मेहता भी अधिकृत प्रत्याशियों के सामने चुनाव मैदान में हैं. यह सामान्य टिकट नाराजगी से थोड़ा अलग मामला है. ऐसे नेताओं के अपने समर्थक और स्थानीय संपर्क होते हैं. अगर ये लोग चुनाव तक मैदान में टिके रहते हैं तो बीजेपी के अधिकृत उम्मीदवार को सीधे नुकसान पहुंच सकता है.
कांग्रेस की कहानी भी बहुत अलग नहीं
कांग्रेस में भी बगावत का आंकड़ा बड़ा है. श्रीगंगानगर में कांग्रेस के 45 बागी मैदान में हैं. बालोतरा में 34, जैसलमेर में 24 और बाड़मेर में 21 बागी कांग्रेस प्रत्याशियों की राह मुश्किल कर रहे हैं. सीसवाली और कुचेरा में 21-21 बागी चुनाव लड़ रहे हैं. झालरापाटन में 19 और पिड़ावा में 18 बागी मैदान में हैं. कोटपूतली और पदमपुर में कांग्रेस के 25-25 बागी बताए जा रहे हैं, जबकि बीकानेर में 13 बागियों ने पार्टी का गणित बिगाड़ा है.
कांग्रेस के प्रमुख बागी आंकड़े
निकाय कांग्रेस के बागी
श्रीगंगानगर 45
बालोतरा 34
कोटपूतली 25
जैसलमेर 24
बाड़मेर 21
सीसवाली 21
कुचेरा 21
झालरापाटन 19
पिड़ावा 18
पदमपुर 25
बीकानेर 13
मान लीजिए किसी वार्ड में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है. दोनों पार्टियों का अपना मजबूत वोट बैंक है. इसी बीच बीजेपी का कोई मजबूत स्थानीय दावेदार टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ता है. ऐसे में वह वोट सीधे कांग्रेस को नहीं देता, लेकिन बीजेपी के उम्मीदवार के वोट जरूर काट सकता है. इसलिए बागी उम्मीदवार कई सीटों पर जीतने के लिए नहीं, बल्कि अधिकृत प्रत्याशी की जीत रोकने के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है. निकाय चुनाव में कई वार्डों में जीत और हार का अंतर बहुत कम रहता है. ऐसे में कुछ सौ वोट भी पूरा चुनाव पलट सकते हैं. अगर किसी मजबूत बागी को एक-दो हजार वोट मिल जाते हैं तो वह अपनी पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार की जीत का रास्ता रोक सकता है.
अब दोनों पार्टियों का फोकस एक ही है , बागी बैठाओ
नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों दलों की कोशिश अब यही है कि प्रभावशाली बागियों को किसी तरह चुनाव मैदान से हटाया जाए. पार्टी के नेता ऐसे दावेदारों से संपर्क कर रहे हैं. उन्हें समझाया जा रहा है कि चुनाव में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ जाने से संगठन को नुकसान होगा. लेकिन मुश्किल यह है कि कई बागी सिर्फ टिकट के लिए नाराज नहीं हैं. वे लंबे समय से संगठन में काम कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि चुनाव जीतने की स्थिति में होने के बावजूद उनका टिकट काट दिया गया. ऐसे लोगों के लिए सिर्फ यह कहना कि पार्टी का फैसला मानिए, काफी नहीं होगा. यहीं से मान-मनुहार की राजनीति शुरू होती है.
वापसी की आखिरी कोशिश क्यों जरूरी है?
पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि बागी अगर नाम वापसी तक मैदान छोड़ देते हैं तो नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है. लेकिन अगर नाम वापसी के बाद भी वे चुनाव मैदान में बने रहते हैं तो पार्टी के पास उन्हें रोकने का रास्ता काफी सीमित हो जाएगा. इसीलिए आने वाले समय में दोनों पार्टियों के बड़े नेता और स्थानीय संगठन अपने-अपने प्रभावशाली बागियों से संपर्क बढ़ाएंगे. किसी को संगठन में जिम्मेदारी का भरोसा दिया जा सकता है, किसी को आगे राजनीतिक मौका मिलने की बात कही जा सकती है और कहीं स्थानीय नेताओं के जरिए समझाइश की जा सकती है.
बीजेपी के सामने पांच बड़ी चुनौतियां
करीब 9 हजार बागियों के अनुमान से बड़ी संख्या में सीटों पर वोट बंटने का खतरा
श्रीगंगानगर, बालोतरा और निम्बाहेड़ा जैसे इलाकों में ज्यादा बगावत
पुराने पदाधिकारी और पूर्व जनप्रतिनिधि भी मैदान में
निर्दलीय बागी पार्टी के पारंपरिक वोट को प्रभावित कर सकते हैं
मजबूत बागियों को समय रहते बैठाना सबसे बड़ी प्राथमिकता
कांग्रेस के सामने पांच बड़ी चुनौतियां
8 हजार से ज्यादा बागियों का अनुमान
बालोतरा, जैसलमेर और बाड़मेर में ज्यादा असंतोष
कई जगह पुराने नेताओं और पदाधिकारियों का मैदान में उतरना
पिड़ावा जैसे इलाकों में संगठन से बाहर जाने वाले नेताओं का असर
अधिकृत प्रत्याशियों के वोट बंटने का सीधा खतरा


