ग्वालियर
मध्य प्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच में एक केस की अपील में 329 दिन की देरी होने पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए सीएमएचओ पर तीन लाख का जुर्माना लगाया है. ये सजा व्यक्तिगत रूप से अधिकारी पर लगाते हुए कोर्ट ने कहा है कि, उन्हें 7 दिनों में ये रकम अपनी जेब से रजिस्ट्री में जमा करना होगी. साथ ही विभागीय प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं लापरवाह ओआईसी और अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की जाए।
11 महीने की देरी पर कोर्ट की नाराजगी
असल में मामला स्व राजेंद्र सिंह परमार के वारिसों के वारिसों के खिलाफ लगायी गई मध्य प्रदेश शासन की याचिका से जुड़ा है. जिसमें शासन ने राजेंद्र परमार के क़ानूनी वारिस मुन्नी देवी और अन्य के खिलाफ 329 दिनों की देरी से कोर्ट में अपील पेश की थी. अपील पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकारी अफसरों के इस रवैये को सिर्फ लापरवाह ना मानते हुए जानबूझ कर की गई देरी माना है।
सीएमएचओ पर लगाया 3 लाख का व्यक्तिगत जुर्माना
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगल पीठ ने अपील पर सुनवाई के दौरान ग्वालियर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जो इस मामले में ऑफिसर इन चार्ज (ओआईसी) के तौर ओर पेश हुए थे, पर नाराजगी जतायी. क्योंकि इस भारी देरी के बावजूद उन्होंने एक सामान्य और अस्पष्ट आवेदन लगाया. साथ ही वे आवेशन में कोई संतोषजनक कारण भी नहीं बता सके. इन हालातों को देखते हुए कोर्ट ने उन पर 3 लाख रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया और यह राशि सात दिवस में रजिस्ट्री में जमा करने का आदेश दिया है।
कोर्ट की सरकार को चेतावनी
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि, अफसरों द्वारा लगातार अपीलों में देरी कोई महज लापरवाही नजर नहीं आती बल्कि इसके पीछे कोई मंशा की आशंका भी जतायी. कोर्ट ने कहा कि, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई बार सख्त निर्देश के बावजूद सरकारी अधिकारी और ओआईसी न्यायालीन मामलों में बेहद सुस्त रवैया अपना रहे हैं. भविष्य यदि इस तरह का मामला दोबारा आया तो अदालत इसके लिए जिले के कलेक्टर और अधिकारियों को जिम्मेदार माना जाएगा।


