बीएएमएस की क्लास में टीचर कहते थे या तो तैयारी कर लो या फिर कॉलेज आना छोड़ दो, मैंने डॉक्टर बनने के सपने को चुना
भिलाई(mediasaheb.com). कवर्धा जिले के अतरिया दामापुर बाजार के रहने वाले गौरव परिहार आज अपने क्षेत्र में किसी पहचान के मोहताज नहीं है। उनके गांव में यदि किसी डॉक्टर का जिक्र होता है तो सबसे पहले नाम गौरव का आता है। आए भी क्यों ने सीमित संसाधनों और गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़कर आज उनका बेटा रायपुर मेडिकल कॉलेज से एमएस ऑर्थोपेडिक्स की पढ़ाई जो कर रहा है। डॉ. गौरव सिंह परिहार ने बताया कि बचपन से उनके पिता चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने। इसलिए मुझे पढऩे के लिए मोटिवेट करते थे। ग्रामीण परिवेश के कारण उस वक्त मेडिकल एंट्रेस और एमबीबीएस की पढ़ाई की ज्यादा जानकारी तो नहीं थी इसलिए 12 वीं बोर्ड के बाद एग्रीकल्चर का एग्जाम दिया। उसमें रैंक काफी अच्छा आया। सबने कहा मेडिकल कॉलेज के लिए ट्राई करो, इसलिए जी जान से मेडिकल एंट्रेस की तैयारी में जुट गया। शुरूआत काफी धीमी और भटकाव भरा रहा। अलग-अलग विषयों की अलग-अलग जगहों में पढ़ाई करने के कारण सेल्फ स्टडी के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था। नतीजा यह निकला कि जितना सोचा था रिजल्ट उससे भी ज्यादा खराब आया। अपनी गलतियों से सीख लेकर अगले साल एक ऐसे कोचिंग में एडमिशन लिया जहां सभी विषयों की पढ़ाई एक ही छत के नीचे होती है। शॉर्ट नोट्स और सिलेबस के हिसाब से पढ़ाई में मन लगता गया। तीन साल के ड्रॉप के बाद साल 2011 में सीजी पीएमटी क्वालिफाई करके बिलासपुर मेडिकल कॉलेज पहुंच गया। तीन साल के ड्रॉप में एक चीज थी जो हमेशा पॉजिटिव एनर्जी देती थी वो है परिवार और रिश्तेदारों का सपोर्ट। सबने निराश होने की बजाय हमेशा मनोबल बढ़ाया अच्छे से पढ़ाई करने के लिए।
बेसिक स्ट्रांग करने के लिए करनी पड़ी दोगुनी मेहनत
डॉ. गौरव ने बताया कि जब उन्होंने मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू की तब उनका बेसिक काफी वीक था। इसलिए तीनों विषयों के बेसिक को स्ट्रांग करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ी। रिजल्ट खराब आने पर जहां सारे दोस्त उदास हो जाते तब मैं ड्रॉपर्स को देखकर खुद को मोटिवेट करता था। शुरूआती दौर में फिजिक्स के न्यूमेरिकल्स मेरे पल्ले ही नहीं पड़ते थे। घंटों इनके साथ मैं जूझता रहता था। कहते हैं प्रैक्टिस मेक परफेक्ट। कुछ महीनों बाद यही न्यमेरिकल्स साल्व करने के लिए मैं दोस्तों से कॉम्पिटिशिन करने लगा। पढऩे के हेल्दी माहौल का बहुत ज्यादा असर रिजल्ट पर पड़ा। इसलिए बिना हारे सफलता की सीढ़ी चढ़ पाया।
सचदेवा से मिला मागदर्शन आया काम
मेडिकल एंट्रेस की सचदेवा से पढ़ाई करने वाले डॉ. गौरव ने बताया कि पहले साल भटकाव के बाद उन्हें दूसरे साल सचदेवा ज्वाइन करके सही मार्गदर्शन मिला। यहां के टीचर्स हर बच्चे को फैमिली की तरह ट्रीट करते हुए उनके हर जरूरत का ध्यान रखते हैं। टेस्ट सीरिज में अलग-अलग जगहों से स्टूडेंट टेस्ट देने आते थे। ऐसे में कॉम्पिटिशन का एक हेल्दी माहौल मिलने लगा। जब कभी नंबर कम आते तो अगले टेस्ट में बेस्ट करने के लिए जुट जाता था। तीसरे ड्रॉप में मैंने बीएएमएस भी ज्वाइन कर लिया था। बीएएमएस के क्लास में अक्सर टीचर्स कहते कि दोनों में से किसी एक को चुनकर आगे बढ़ो। मैंने आखिरकार एमबीबीएस को चुना। अपना पूरा ध्यान मेडिकल एंट्रेस की ओर फोकस किया। सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर ने इस दौरान काफी मदद की। मैं बिंदास होकर उनसे कभी भी मिलने चला जाता। अपने मन की हर बात शेयर करता था। उनकी मोटिवेशन बातें सुनकर दोगुने उत्साह से भर जाता था।
पढऩे के साथ ब्रेक लेना भी जरूरी है
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से कहना चाहता हूं कि सिर्फ पढ़ते ही नहीं रहना बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए बीच-बीच में ब्रेक लेना भी जरूरी है। ब्रेक के दौरान आप मैदान में कोई खेल खेल सकते हो या फिर कहीं घूम के आ सकते हैं। ऐसा टाइम टेबल बनाना चाहिए जिससे एक दिन में हम सभी विषय को बारी-बारी से पढ़ सके। सबसे जरूरी है खुद का कॉन्फिडेंस बनाकर रखना है। कभी गिवअप करने के बारे में नहीं सोचना है।(For English News : thestates.news)

