भिलाई. (media saheb.com) गणित में रूचि होने के बाद भी डॉक्टरी को प्रोफेशन के रूप में अपनाने वाले भिलाई के जाने-माने आई स्पेशलिस्ट डॉ. शशांक सेन ने अपने पहले प्रयास में सबसे कठिन माने जाने वाले ऑल इंडिया पीएमटी क्वालिफाई कर लिया था। अपने सपने को साकार करने के लिए वे नहीं चाहते थे कि उनका एक भी साल ड्रॉप में बेकार हो इसलिए 11 वीं से स्कूल के सिलेबस के साथ मेडिकल एंट्रेस के सिलेबस को पढऩा शुरू कर दिया था। डॉ. शशांक कहते हैं कि मैं नहीं जानता था कि मेरा सलेक्शन होगा या नहीं, लेकिन अपनी मेहनत में कोई कमी नहीं छोडऩा चाहता था। इसलिए हर परीक्षा को बेहद गंभीरता से लेता था। चाहे वो वीकली टेस्ट हो या मंथली टेस्ट सभी में अच्छे नंबर लाने के लिए जी-जान से पढ़ाई करता। यही कारण है कि 12 वीं बोर्ड एग्जाम जिस साल दिया उसी साल ऑल इंडिया पीएमटी में भी चयनित हो गया। साल 2002 में जब पहली बार संबलपुर मेडिकल कॉलेज में कदम रखा तो ऐसा लगा कि जीवन के सुनहरे अध्याय की शुरूआत हो गई है।
बचपन में तय कर लिया था डॉक्टर बनना है
डॉ. शशांक ने बताया कि उनके पिता इंजीनियर है। इसलिए उन्हें गणित में विशेष रूचि था। गणित पंसदीदा विषय भी था, लेकिन घर में डॉक्टरी प्रोफेशन में कोई नहीं गया था। इसलिए मैंने बचपन में ही तय कर लिया था कि बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा। जब दसवीं बोर्ड के बाद 11 में विषय चयन करने का मौका मिला तो मैंने बायो और मैथ्स साथ में लेकर पढ़ाई करने का निश्चय किया। मेडिकल फील्ड में आने वाले अधिकतर बच्चों के लिए फीजिक्स कठिन सब्जेक्ट बन जाता है, लेकिन मैथ्स और बायो की साथ-साथ पढ़ाई के चलते फीजिक्स मेरा स्ट्रांग प्वाइंट रहा। जिसका बहुत ज्यादा लाभ मेडिकल एंट्रेस में मिला। 11 वीं की परीक्षा देने के बाद गर्मी छुट्टियोंं में घूमने की बजाय मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए क्रैश कोर्स ज्वाइन कर लिया। इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने के चलते सफलता पहले ही प्रयास में मिल गई।
सचदेवा के पॉजिटिव माहौल में मिली आगे बढऩे की प्रेरणा
डॉ. शशांक ने बताया कि साल 2002 में मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए बेस्ट कोचिंग सचदेवा हुआ करता था, जो आज भी है। जब मैंने 11 वीं में कै्रश कोर्स ज्वाइन किया तो सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर हमेशा मुझसे कहते थे कि शशांक तुम कर सकते हो। तुम्हारे अंदर काबिलियत है तुम पहले प्रयास में ही मेडिकल एंट्रेस क्वालिफाई कर सकते हो। उनकी इसी मोटिवेशनल बातों से मुझे बहुत ज्यादा पॉजिटिव एनर्जी मिलती गई। सचदेवा के टीचर्स भी हर सब्जेक्ट की कई बार रिविजन करा देते थे, जिससे डाउट का सवाल ही नहीं रहता था। टेस्ट सीरिज में अपने से बड़े उम्र के स्टूडेंट्स के साथ काम्पीटिशन करके खुद को परखने को मौका मिलता था। जब कभी कम नंबर आने पर निराश होता तो जैन सर पीछे से बूस्ट करते कि बस थोड़ी मेहनत और करनी है। आज जब कोई मरीज अपनी तकलीफ दूर होने के बाद धन्यवाद बोलकर जाता है तो खुद के डॉक्टर होने पर गर्व महसूस होता है।
रिविजन बहुत जरूरी
जो बच्चे इस साल नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि आप कितना भी क्यों न पढ़ लें लेकिन एग्जाम से पहले रिविजन बहुत जरूरी है। कई बार बच्चे एग्जाम से चंद घंटे पहले भी नए-नए टॉपिक पढ़ते रहते हैं, इनसे बचना चाहिए। नए टॉपिक की बजाय जो आपने अच्छे से पढ़ा है उसका बार-बार रिविजन करना चाहिए। रिविजन के लिए सालभर ऐसे टाइम मैनेज करना चाहिए ताकि आपको रिविजन के लिए भरपूर समय मिल सके। एक टास्क बनाकर पढ़ाई करना चाहिए इससे कॉन्फीडेंस भी बढ़ता है। (the states. news)

