मीना कुमारी जयंती आला दर्जे की शायरा वे ‘ट्रेजेडी क्वीन’ के नाम से मशहूर हुईं। लाजवाब अभिनय शैली, यादगार फ़िल्में। हिंदी फ़िल्मों में दिलीप साहब और मीना कुमारी दो ऐसे नाम हैं, जिनकी अदाकारी और संवाद-अदायगी एकदम ख़ास है, जो रुपहले पर्दे पर एक अलग ही प्रभाव छोड़ती है।
ये दुनियां अगर मिल भी जाए तो क्या है..
शायद , शायर ने मानो इसे मीना कुमारी के लिए ही लिखा हो, उनकी शायरी बहुत ही उम्दा है, ज़िंदगी की हक़ीक़त बयां करती है। उनकी निजी जिंदगी में बहुत अकेलापन था , सच्चे प्रेम की तलाश थी ।
सच्चे अर्थों में एक आर्टिस्टिक माइंडसेट ..
मीना कुमारी जी की मेरी निजी पसंद की तीन फ़िल्में हैं – साहिब बीबी और ग़ुलाम की छोटी बहू, प्रदीप कुमार के साथ एक डॉक्टर की भूमिका में फ़िल्म आरती, और उनकी अमर फ़िल्म *पाकीज़ा*।
किंतु आज हम आपको उनके एक और रूप से परिचित करा रहे हैं। वे एक आला दर्जे की शायरा भी थीं। उनकी लिखी नज़्में बहुत ही जानदार हैं, एक-दो तो उन्होंने स्वयं अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड भी की थीं। उनकी यह ग़ज़ल जो मुझे पसंद है –
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता,
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता।
जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही,
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता।
हँस-हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े,
हर शख़्स की क़िस्मत में इनाम नहीं होता।
बहते हुए आँसू ने आँखों से कहा थम कर,
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता।
दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती,
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता।
उनकी ये नज़्में भी बड़ी ख़ूबसूरत हैं –
हम नहीं आग से बच-बच के गुज़रने वाले
न इंतज़ार, न आहट, न तमन्ना, न उम्मीद,
ज़िंदगी है कि यूँ बेहिस हुई जाती है
इतना कह कर बीत गई हर ठंडी-भीगी रात,
सुख के लम्हे, दुख के साथी, तेरे ख़ाली हाथ
हाँ, बात कुछ और थी, कुछ और ही बात हो गई,
और आँख ही आँख में तमाम रात हो गई
कई उलझे हुए ख़यालात का मजमा है ये मेरा वजूद,
कभी वफ़ा से शिकायत, कभी वफ़ा मौजूद
ज़िंदगी आँख से टपका हुआ बेरंग क़तरा,
तेरे दामन की पनाह पाता तो आँसू होता।
– *डॉ. संजय अनंत ©*


