*(कथा सम्राट प्रेमचंद जयंती)*
कथा सम्राट प्रेमचंद की कथा पर आधारित थी, सत्यजीत रे की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’।
यदि हम यह समझते हैं कि हमने कोई बड़ी लड़ाई लड़ी और हार गए, इसलिए हम ब्रिटिश राज के गुलाम बने, तो आप गलत हैं।
उस दौर में देश पतन के रसातल को छू रहा था। हमारे नवाब, राजा, जमींदार सबका मकसद अपना खजाना भरना था। देश या आम जन उनके लक्ष्य तो छोड़िए, उनके चिंतन में भी नहीं थे। केवल विलासिता और लूट ही उनका ध्येय था।
सत्यजीत रे की अन्य फिल्मों की तरह यह फिल्म धीमी कतई नहीं है। यह आम जन की समझ में आने वाली और रोचक है।
यदि उस दौर को समझने का प्रयास करें, तो समझ आता है कि दरअसल अंग्रेजों ने भारत को गुलाम नहीं बनाया, वरन उस काल में हमारे राजा-महाराजा, नवाब, सामंत इस स्थिति में ही नहीं थे कि वे शासन कर सकें।
राजा, सामंत, नवाब, जमींदार से लेकर कोतवाल तक सब अय्याशी और लूट-खसोट में डूबे थे। देश और जनता के लिए किसी के पास समय नहीं था।
लखनऊ अवध की शान था। अवध की शान नवाब वाजिद अली शाह भले ही महान संगीतकार, शायर, कलापारखी रहे हों, पर जनरल जेम्स आउट्रम के सामने उन्होंने पूरी तरह समर्पण कर दिया। फिर भारी मन से लिखा –
“जब छोड़ चले लखनऊ नगरी, कहो हाल आदम पर क्या गुजरी”
फिल्म में वाजिद अली शाह के रोल में अमजद खान हैं। यदि आप नवाब के मूल चित्र से तुलना करें, तो अमजद खान का चयन आपको सही लगेगा। पात्र के साथ अमजद खान ने न्याय किया है। कत्थक नृत्य करते हुए अमजद खान आपको भले ही अटपटे लगें, किंतु वाजिद अली शाह कत्थक के प्रवीण नर्तक थे, अच्छे शायर और खाने के शौकीन। आज भी उनकी रेसिपी अनेक सितारा होटलों में उपयोग की जाती है। जब सत्यजीत रे की इस फिल्म को देखते हैं, तो आप भी सहमत हो जाते हैं कि भाई, बाकी सब तो ठीक है, पर यह बंदा लखनऊ के नवाब के तख्त पर बैठने लायक तो कतई नहीं था।
और पूरी दुनिया से बेखबर कथा के मुख्य पात्र मिर्जा सज्जाद अली (संजीव कुमार) व मीर रोशन अली (सईद जाफरी) जो शतरंज के खेल में मशगूल हैं, सुबह से शाम तक आराम, नौकर-चाकर… मिर्जा सज्जाद (संजीव कुमार) कहते हैं –
“हमसे हमारी बेगमें नहीं संभलतीं… गोरों से जंग क्या खाक लड़ेंगे।”
जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना लखनऊ पर कब्जा करती है, तब ये दोनों पास के किसी गांव में बरगद के तले अपने नौकर-चाकर के साथ हुक्के का कश लेते, पान की गिलौरी चबाते, शतरंज की बाजी में व्यस्त होते हैं।
यह एक प्रकार का व्यंग्य है।
मुंशी प्रेमचंद ने हमारे सामने यथार्थ को रखा है, मानो वे इस कथा के माध्यम से अंग्रेजों की सफलता और देश के परतंत्र होने की वास्तविकता पाठकों को बताना चाहते हों।
फिल्म बहुत अच्छी है। यह आपको 19वीं सदी के भारत यानी 1857 के आसपास का समय परदे पर यथावत दिखाती है। डॉ.संजय अनंत©


