श्री ऋषभदेव जैन मंदिर सदर बाजार में चातुर्मासिक चैदस पर विशेष प्रवचन कल
रायपुर (mediasaheb.com)
श्रीऋषभदेव मंदिर
सदरबाजार में मंगलवार, को चातुर्मासिक प्रवचन के अंतर्गत सुशिष्या
साध्वीश्री पुण्यधराश्रीजी म.सा. ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा
कि इस दुनिया में हर
जीव सुख चाहता है। हर क्षण-हर पल वह सुख की तलाश में लगा रहता है, उसे दुख नहीं चाहिए। किन्तु स्थायी सुख उसे मिलता
नहीं है। शास्वत सुख की प्राप्ति से पूर्व यदि इस दुनिया में सुखी रहना है तो इसका
मूलमंत्र यही है कि हर परिस्थितियों में स्वयं को ढालना वह सीख जाए, तो वह सुखी हो जाएगा। जो चीज तुम्हें नहीं चाहिए
और जो त्याज्य है, उसे तुम पहले ही छोड़ दो तो फिर जीवन में कभी दुख
आने वाला ही नहीं है। इस संसार में जो छूटने ही वाला है और वह तुम्हे चाहिए पर मिल
नहीं रहा है तो उसकी अपेक्षा-आसक्ति को छोड़ दो।
साध्वीश्री ने आगे
कहा कि इस दुनिया में चाहे सम्मान मिले या अपमान, हमें
उन दोनों ही स्थितियों में आनंदित रहने का प्रयास करना होगा। किंतु अक्सर व्यक्ति
सम्मान के समय स्वयं पर अहंकार करता है और अपमान के समय हमेशा विचलित होकर डगमगा
जाता है, उसके मन में सामने वाले के प्रति द्वेष का भाव
उत्पन्न हो जाता है। इसका कारण एकमात्र यही है कि उसे दुख पसंद नहीं है। सम्मान
उसे अच्छा लगता है, अपमान अच्छा नहीं लगता। सुख उसे अच्छा लगता है, दुख अच्छा नहीं लगता। समुद्र मंथन के समय जब अमृत
निकला तो उसका पान करने वाले देव कहलाए और जब विष निकला तो उसका पान करने वाले
महादेव कहलाए। न केवल सम्मान की घड़ियों में अपितु अपमान की घड़ियों में भी जो
आनंदपूर्वक रहे वह महादेव है। प्रभु परमात्मा ने जितना दिया है, उसमें हमेशा खुश रहें। परमात्मा ने हमें यह अनमोल
मानव जीवन, शरीर की स्वस्थता दी है यह जीव के लिए बहुत कुछ
है। किन्तु मनुष्य है कि वह यही रोना रहता है कि परमात्मा ने मुझे कुछ नहीं दिया।
जो व्यक्ति हमेशा कुछ नहीं दिया का रोना रोता रहता है वास्तव में उसे कुछ नहीं
मिलता। थोड़े में भी आनंद मनाने वाला ही सदा सुखी रहता है।
साध्वीश्री ने कहा
कि व्यक्ति की इच्छाएं असीमित और अंतहीन होती हैं, वे
कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होतीं, इसीलिए
सुखी होने का मूलमंत्र यही है कि हर परिस्थिति में मन की प्रसन्नता बनी रहे। इस
संसार के हर सुख के साथ दुख जुड़ा हुआ है, सुख
का समय समाप्त होते ही दुख आरंभ होता है और दुख के समापन के बाद सुख आरंभ होता है।
सच कहे तो दुख के बिना व्यक्ति को सुख की अनुभूति हो ही नहीं सकती। यदि हमेशा सुख
ही सुख रहे और दुख कभी आए ही न तो दुनिया के उस सुख में भी जीव को आनंद नहीं है।
वास्तव में सुख और दुख की अनुभूतियां मनुष्य के मन के भावों पर निर्भर हैं। जो
सत्-चित्-आनंद को साधने की साधना में सफल हो जाता है, वह सर्वदा आनंदित रहता है, बाहरी दुनिया के सुख या दुख उसे प्रभावित नहीं
करते।
आज विवेकानंद नगर दीक्षार्थियों का
बहुमान
श्री जैन श्वेताम्बर चातुर्मास समिति
के अध्यक्ष विमलचंद मालू, सचिव अभिषेक,
निलेश गोलछा व प्रचार-प्रसार प्रभारी
तरूण कोचर ने बताया कि बुधवार,
17 नवम्बर को विवेकानंद नगर स्थित
श्रीसंभवनाथ जिनालय परिसर में आयोजित समारोह में संयम मार्ग अंगीकार करने जा रहे
छत्तीसगढ़ के दीक्षार्थियों का जैन समाज द्वारा अभिनंदन किया जाएगा। इस प्रसंग पर
संभवनाथ जिनालय से सुबह 8.30 बजे गाजे-बाजे के साथ दीक्षार्थियों का वर्षीदान वरघोड़ा निकाला
जाएगा। इसके बाद श्रीज्ञान वल्लभ उपाश्रय में साध्वी भगवंतों के सानिध्य में
धर्मसभा होगी, जिसमें दीक्षार्थियों का अभिनंदन किया जाएगा।
चातुर्मासिक चैदस पर विशेष प्रवचन कल
गुरूवार, 18 नवम्बर चातुर्मासिक
चैदस को प्रातः 9 बजे से श्रीऋषभदेव मंदिर सदरबाजार के आराधना हाॅल में मंडल प्रमुखा
साध्वीश्री मनोरंजनाश्रीजी म.सा.,
सरलमना साध्वीश्री सुभद्राश्रीजी म.सा., नवकार जपेश्वरी
साध्वीश्री शुभंकराश्रीजी म.सा. के विशेष प्रवचन होंगे।

