- गरीबी में पढ़कर मेडिकल एंट्रेस क्वालिफाई करने वाले डॉ. हेमराज की कहानी से मिली प्रेरणा
- पापा स्कूल के टीचर्स को बोलकर आते थे ठीक से न पढ़े तो करना पिटाई
भिलाई(media saheb.com)| छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के आखिरी छोर में बसे अमलीपदर गांव के नितेश ने 10 वीं कक्षा में पेपर में छपे धमतरी जिले के गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉ. हेमराज की कहानी पढ़ी। इंटरव्यू में डॉ. हेमराज ने बताया था कि उनके पास फीस भरने तो क्या परिवार के एक वक्त का पेट भरने लायक भी पैसा नहीं था। फिर भी उन्होंने अपना सपना नहीं छोड़ा आज डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा कर रहे है। डॉ. हेमराज के संघर्ष की कहानी ने नितेश के बाल मन में ऐसी जगह बनाई कि विपरीत आर्थिक परिस्थितियों से लड़कर आज नितेश भी एक सफल डॉक्टर बनकर गरियाबंद जिले के सरकारी अस्पताल में लोगों की सेवा कर रहे हैं। नितेश ने बताया कि उनकी मेडिकल की पढ़ाई में किसी तरह की बाधा न आए इसलिए पिता को पुश्तैनी जमीन बेचनी पड़ी। घर की आर्थिक स्थिति इस कदर खराब थी कि मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए भी पिता को रिश्तेदारों से उधार लेकर फीस भरना पड़ा। शायद परिवार का त्याग ही था कि मैं परिस्थिति बदलने के लिए खुद को तपा पाया। 12 वीं बोर्ड के बाद तीन साल ड्रॉप लेकर फाइनली सीजी पीएमटी में 103 रैंक हासिल करके सिम्स बिलासपुर में एडमिशन लिया।
जनरल कैटेगरी के कारण दो साल क्वालिफाई करने के बाद भी सीट नहीं मिली
डॉ. नितेश ने बताया कि उन्होंने साल 2012 में सीजी पीएमटी क्वालिफाई किया। तीन साल के ड्रॉप में दो साल थोड़े-थोड़े नंबर्स और जनरल कैटेगरी होने के कारण एमबीबीएस की सीट हासिल करने में सफल नहीं हो पाया। ऐसे समय में हार मानने के बजाय पिता की उम्मीदों से भरा चेहरा याद आ जाता था। इसलिए बिना रूके बस पढ़ता चला गया। हिंदी मीडियम और ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण कई बार थोड़ी निराश होती थी कि पता नहीं सबकुछ ठीक हो पाएगा या नहीं पर दूसरे ही पल लगता कि परिवार को आर्थिक रूप से संभालने के लिए मेरा डॉक्टर बनना कितना जरूरी है। लगातार फेल्यिर देखकर रिश्तेदारों से लेकर आस-पड़ोस के लोग भी पैरेंट्स को ताने मारते थे। बावजूद परिवार का भरोसा हमेशा बना रहा।
महंगे कोचिंग के फीस भरने के नहीं थे पैसे, तब सचदेवा ने बढ़ाया हाथ
डॉ. नितेश ने बताया कि उनके पिता कृषक हैं, जब 12 वीं बोर्ड के बाद भिलाई में कोचिंग के लिए सोचा तो उनके पास फीस भरने के पैसे नहीं थे। ऐसे में 12 बोर्ड में 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक आने के कारण सचदेवा ने फीस माफ कर दिया। एक साल कोचिंग के बाद बाकी दो साल सेल्फ स्टडी करके तैयारी की। अगर सचदेवा कॉलेज के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर ने मुझे कोचिंग में एडमिशन नहीं दिया होता था शायद डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता। दो कमरे के मकान में रहने वाले गरीब बच्चे के लिए मेडिकल की कोचिंग आज भी नामुमकिन से लगती है पर जैन सर ने इसे मुमकिन बनाया।
पिता जी स्कूल में बोलकर आते थे टीचर्स को पीटने के लिए
डॉ. नितेश ने बताया कि उनके पिता पढ़ाई को लेकर बहुत ज्यादा अनुशासनप्रिय थे। यही कारण था कि कई बार वे स्कूल में जाकर टीचर्स को बोलकर आते थे कि यदि बेटा ठीक से नहीं पढ़े तो उसे जरूरत पढऩे पर ठीक से पीटना भी। आज जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि एक गरीब परिवार का अनुशासन ही था जिसके कारण ही मैं डॉक्टर बन पाया। रायपुर में 12 वीं बोर्ड की पढ़ाई के दौरान जब भी मैं मेडिकल कॉलेज के सामने से गुजरता था तो सोचता था कि एक दिन मैं भी यहीं से डॉक्टर बनकर निकलूंगा।
बुरे दिन ही आपको सिखाते हैं कैसे बढऩा है जीवन में आगे
डॉ. नितेश कहते हैं कि इंसान को अपने बुरे दिन कभी नहीं भूलने चाहिए क्योंकि यही वो वक्त होता है जो आपको हालातों और विपरीत परिस्थितियों से लडऩा सिखाता है। हर काम का रीजन होता है। जब बच्चा उस रीजन के बारे में सोचना शुरू कर देता है तो उसके लिए समर्पित होकर पढऩा भी शुरू कर देता है। इस साल जो बच्चे नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे यही कहूंगा कि हालातों से डरने की बजाय डटकर सामना करना सीखो। मुश्किलें आते रहते हैं आपको सामना करके खुद के लिए बेहतर विकल्प तलाशना है। कभी हार नहीं मानना, खुद पर भरोसा रखना।(the states. news)

