रायपुर, (media saheb.com) कांग्रेस विधायक बृहस्पत सिंह के छत्तीसगढ़ विधानसभा में खेद व्यक्त करने के साथ भले ही विधायक के काफिले पर हमले के बाद उठे विवाद का पटाक्षेप हो गया हो। लेकिन इस पूरे मामले ने राज्य में सत्तासीन कांग्रेस के अंदरुनी कलह को उजागर कर दिया है। सरगुजा इलाके के रामानुजगंज के तेजतर्रार विधायक बृहस्पत सिंह के काफिले पर अंबिकापुर में 24 जुलाई को हमला हुआ था। इसके बाद बृहस्पत सिंह ने स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव पर आरोप मढ़ दिया कि वे उन्हें जान से मरवाना चाहते हैं। उधर विधायक के साथ ऐसी हरकत करने वालों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस बीच 26 जुलाई से शुरू हुए विधानसभा सत्र में तीन दिनों तक यह मामला छाया रहा। हालांकि बृहस्पत सिंह ने विधानसभा में कहकर खेद जता दिया कि उन्होंने भावावेश में सिंहदेव का नाम लिया था। इसके बाद मामला तो शांत हो गया लेकिन कांग्रेस के भीतर चल रहे उठापटक की झलक दिखा गया। यह वाकई भावावेश था या कुछ और? सिंहदेव की नाराजगी उनकी छवि के अनुरूप ही थी, लेकिन इसके मायने इससे कहीं अधिक निकाले जा रहे हैं। लोगों को तो ढाई-ढाई साल के कार्यकाल के कथित फार्मूले का फांस भी इसमें नजर आया। अब तक इस फांस की कसक बयानों में दिखती थी। यह मामला तब और संगीन हो गया जब सिंहदेव यह कहते हुए विधानसभा की कार्यवाही छोड़कर बाहर निकल गए कि सरकार को इस मामले में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और वे तब तक कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे जब तक उनकी भूमिका स्पष्ट न हो जाए। मध्य प्रदेश, पंजाब और राजस्थान में कांग्रेस में चल रहे सत्ता संघर्ष की तरह छत्तीसगढ़ में भी बवाल की आस लगाए विपक्ष को तो मानो मौका मिल गया। विधानसभा में इसे संवैधानिक संकट बताते हुए विपक्ष ने खूब हंगामा मचाया औऱ तीन दिन तक विधानसभा की कार्यवाही को बाधित किया। छत्तीसगढ़ की राजनीति को जानने-समझने वालों के लिए इस विवाद को बूझना कोई कठिन बात नहीं थी। यहां की राजनीति में राज परिवारों की कभी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज भी इन महलों या राज परिवार के सदस्य चुनावी किस्मत आजमाते हैं। जिनका परंपरागत विरोध अब भी कायम है। ताजा विवाद की पृष्ठभूमि भी इससे अलग नहीं है। यह बात अलग है कि इन विरोधियों को कभी विपक्ष का साथ मिलता है तो कभी सत्ता पक्ष का। इस बार जब बवाल मचा तो विपक्ष ने इसे लपकने में देरी नहीं की। विधानसभा में विवाद के पटाक्षेप पर पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना कहकर चुटकी भी ली। इससे ज्यादा की स्थिति बनती भी नहीं थी।
बता दें कि छत्तीसगढ़ में इन तीनों राज्यों के मुकाबले कांग्रेस अधिक सुविधाजनक स्थिति में है। यहां मध्य प्रदेश की तरह विधायकों को तोड़ सकने जैसे हालात नहीं हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों की माने तो छिटपुट असंतोष के बीच मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आने वाले चुनाव में राज्य में कांग्रेस की सत्ता कायम रहे, यह सुनिश्चित करने में लगे हैं। अब तक इसमें कोई बाधा भी नजर नहीं आ रही है। यह जरूर है कि ढाई-ढाई साल के कथित फार्मूले की जब-तब चर्चा छिड़ती रहती है। कभी ढाई साल की कुर्सी के दावेदार की ओर से यह बात होती है तो कभी विपक्ष इसकी चर्चा छेड़कर अनिश्चितता पैदा करने की कोशिश करता है। हालांकि मुख्यमंत्री समेत कांग्रेस के राज्य प्रभारी पीएल पुनिया ने साफ कर दिया है कि ऐसा कोई फार्मूला कभी तय नहीं हुआ था। वैसे राज्य में कांग्रेस की सत्ता को ढाई साल से ज्यादा हो रहा है। कांग्रेस हाईकमान की ओर से इस दिशा में कोई कदम उठाने जैसा संकेत दूर-दूर तक नहीं मिला है। राजनीतिक नजरिये से देखें तो छत्तीसगढ़ में इस फार्मूले के फायदे कम नुकसान ज्यादा है। इसलिए कांग्रेस अपने पांव में कुल्हाड़ी मारने जैसा काम भला क्यों करेगी। सत्ता संघर्ष की बात करें तो यह कांग्रेस के मुकाबले भाजपा में ज्यादा है, जिसके चलते कर्नाटक और उत्तराखंड में उसे मुख्यमंत्री बदलना पड़ा। छत्तीसगढ़ में विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा गुटबाजी से मुक्त नहीं है। अब तक तो वह पूरी तरह नकारात्मक समर्थन की आस में है। जहां तक कांग्रेस की बात है तो उसने निगम-मंडलों में थोक में नियुक्ति कर अपने लोगों को संतुष्ट करने की कोशिश की है। जहां तक ढाई साल जैसे फांस या कामकाज में विकेंद्रीकरण की बात है तो इसे लेकर छोटी-मोटी नाराजगी जरूर देखने को मिल सकती है। सत्तासीन पार्टी के लिए यह स्वाभाविक भी है। अब उसे डेढ़ दशक बाद हाथ आई सत्ता को सहेजे रखने की मशक्कत ही करनी है।
संदीप सिंह ठाकुर For English News : the states.news


