जिद्द थी एमबीबीएस से कम कुछ मंजूर नहीं, छोड़ दी डेंटल और आयुर्वेदिक कॉलेज और वेटनरी कॉलेज की सीट
भिलाई(media saheb.com)|एमबीबीएस की सीट
हासिल करने के लिए एक दो नहीं पूरे तीन साल ड्रॉप लेकर तैयारी करने वाले मनोज इन
तीन सालों में कई बार डिप्रेशन के शिकार हुए है। कई बार तो परिस्थितियां ऐसी बनी
कि उन्हें खुद की काबिलियत पर ही शक होने लगा था। कहते हैं जहां जिद्दी मन और कड़ी
मेहनत हो वहां सफलता को आना ही पड़ता है। आखिरकार मनोज ने साल 2014 में ऑल इंडिया
पीएमटी क्वालिफाई करके मेडिकल कॉलेज में कदम रख ही लिया। वाड्रफनगर के रहने वाले
डॉ. मनोज कुमार यादव फिलहाल एमबीबीएस के बाद मेडिकल ऑफिसर के रूप में बिलासपुर
रेलवे अस्पताल में पदस्थ हैं। अपनी स्टूडेंट लाइफ का जिक्र करते हुए कहते हैं कि
बचपन में ही तय कर लिया था कि बड़ा होकर मैं डॉक्टर बनूंगा। जब पैरेंट्स के
साथ चिल्ड्रन हॉस्पिटल जाता तो वहां डॉक्टरों को देखकर बहुत खुश होता था। उनकी
बातें सुनकर डॉक्टरी प्रोफेशन के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ती चली गई। तीन बार असफल
होने के बाद मंजिल तक पहुंच ही गया। लोग अपनी असफलता के कई कारण गिनाते हैं पर
मुझे लगता है कि कारण की बजाय अगर गलतियों को सुधारकर दोबारा मेहनत की जाए तो
सफलता जरूर मिलती है।
गेस्ट लेक्चर में आए डॉक्टर की बातें सुनकर हुआ मोटिवेट
बचपन से होनहार स्टूडेंट रहे डॉ. मनोज ने बताया कि ड्रॉप इयर
में सचदेवा कोचिंग भिलाई में एक बार गेस्ट सेशन में डॉ. संदीप माहेश्वरी आए थे।
उन्होंने एक छोटी सी कहानी सुनाई थी। जिसमें एक 6 और 12 साल के दो भाई रहते हैं। दोनों कुआं के पास खेल
रहे थे। बड़ा भाई अचानक खेलते-खेलते कुआं में गिर गया। छोटे भाई ने बहुत आवाज लगाई
पर कोई मदद के लिए नहीं पहुंचा तब छोटे भाई ने भी कुएं में छलांग लगा दी। किसी तरह
अपने भाई की जान बचाई। इस कहानी का सार समझाते हुए बताया कि आपकी उम्र, काबिलियत विपरीत
परिस्थिति नहीं देखती है। उस समय काम आता है सिर्फ रिस्क लेने का साहस। अगर आपने
रिस्क लिया है तो निश्चित ही सफल होगे। डॉ. संदीप की बातें की सुनकर मैं इतना
मोटिवेट हुआ कि फिर कभी निराशा के भंवर में नहीं डूबा। आखिरी वक्त तक कान्फिडेंस
के साथ एग्जाम दिया।
सचदेवा में आकर सीखा प्रेशर को इग्नोर करना
डॉ. मनोज ने बताया कि मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए उन्होंने
सचदेवा के बारे में काफी सुना था। इसलिए ड्रॉप इयर में सचदेवा कॉलेज भिलाई आ गया।
यहां आकर मैंने सीखा की बेवजह के प्रेशर को कैसे इग्नोर किया जाता है। यहां के
टीचर्स के मार्गदर्शन में बेसिक काफी स्ट्रांग हुआ। फिजिक्स मेरा वीक सब्जेक्ट था।
टीचर्स न सिर्फ फिजिक्स बल्कि बाकी विषयों को भी इतनी सरलता से पढ़ाते कि हर साल
रैंक सुधरते चला गया। डिप्रेशन के दौर में सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर का
बहुत सहयोग मिला। वो हमेशा क्लासरूम में आकर हमें मोटिवेट करते थे। अक्सर क्लास
में कहते थे कि ड्रॉप इयर को गिनने की बजाय केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाए। सफलता आपकी
मेहनत देखती है ड्रॉप नहीं। उनकी छोटी-छोटी प्रेरक कहानियां रोज कुछ नया करने के
लिए प्रेरित करती थी।
नकारात्मक सोच को रखे खुद से दूर
जो बच्चे नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे कहना चाहूंगा कि हमें
नकारात्मक सोच और लोग दोनों से बचना चाहिए। कई बार बढ़ते ड्रॉप सेशन में पैरेंट्स
भी कुछ नया ट्राय करने का दबाव बनाते हैं ऐसे में आप खुद का एक बार आंकलन करे। यदि
आपको लगता है कि आप कर सकते हैं तो बाकी बातों को इग्नोर कर दीजिए। थ्योरी के साथ
प्रैक्टिकल नॉलेज भी लेना जरूरी है। कई हिंदी मीडियम के स्टूडेंट अंग्रे्रजी की
वजह से खुद को कमतर आंक लेते हैं पर सच ये है कि सलेक्ट होने वालों में सत्तर
फीसदी हिंदी मीडियम के ही स्टूडेंट होते हैं। इसलिए मन और संकल्प दोनों को दृढ़
करके पढ़ते रहिए।(the states. news)

