- पहले ड्रॉप में सलेक्शन नहीं हुुआ तो घर वालों ने दिया दूसरे ड्रॉप के लिए हौसला
- बायो-मैथ्स लेकर बोर्ड एग्जाम दिया, मेडिकल एंट्रेस में फिजिक्स बना आसान
भिलाई (media saheb.com)| घर में पोती का जन्म होते ही दादा जी ने उसी वक्त निश्चय कर लिया था कि बेटी बड़ी होकर डॉक्टर बनेगी। उन्होंने बचपन से भारती को डॉक्टरी की पढ़ाई के बारे में बताना शुरू कर दिया। कभी मौका मिलता तो किसी डॉक्टर से मिलाने भी ले जाते। धीरे-धीरे भारती की उम्र बढ़ती गई और दादा जी का सपना उसका सपना बन गया। 11 वीं में जब विषय चयन की बारी आई तो भारती ने डॉक्टर बनने के लिए झट से बायो-मैथ्स सब्जेक्ट ले लिया। भारती जानती थी कि सिर्फ बायो पढऩे से काम नहीं चलेगा बायो के साथ फिजिक्स और कैमेस्ट्री का स्ट्रांग होना भी जरूरी है। इसलिए फिजिक्स को स्ट्रांग करने के लिए दोनों मुख्य विषयों को एक साथ पढऩा तय किया। 12 वीं बोर्ड में रिजल्ट तो काफी अच्छा आया लेकिन मेडिकल एंट्रेस में सफलता नहीं मिली। पैरेंट्स की सलाह मानकर एक साल ड्रॉप लेकर पढ़ाई की इसके बाद भी सलेक्शन नहीं हुआ। लगातार मिल रही असफलता भारती को अंदर से तोड़ रही थी तब घर वालों ने हौसला दिया और दूसरे ड्रॉप के लिए बेटी को तैयार किया। भारती की कड़ी मेहनत और लगन ही थी साल 2014 में नीट क्वालिफाई करके राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज पहुंच गई। राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद रूरल पोस्टिंग पर जॉब कर रही डॉ. भारती चंद्राकर कहती है कि जीतने के लिए खुद के अंदर एक आग का होना बहुत जरूरी है। ड्रॉप इयर काफी डिपे्रशन और प्रेशर से भरा होता है ऐसे में जीतने का जुनून ही आपको आगे बढ़ा पाता है।
पहले अटेम्प्ट में लगा बेसिक है कमजोर
दो साल ड्रॉप लेकर मेडिकल सीट हासिल करने वाली डॉ. भारती ने बताया कि जब उन्होंने मेडिकल एंट्रेस की परीक्षा पहली बार दी तब एहसास हुआ कि बेसिक काफी कमजोर है। बेसिक को स्ट्रांग करने के लिए मैंने सचदेवा कोचिंग ज्वाइन कर लिया। यहां जब टीचर्स ने शुरूआत से सारे सब्जेक्ट को पढ़ाया तब जाकर खुद पर आत्मविश्वास आया। बायो-मैथ्स स्टूडेंट होने के बाद भी तीन विषयों के बेसिक को स्ट्रांग करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। ड्रॉप इयर में निराश होती थी। एक भी टेस्ट में कम नंबर आते तो दिमाग सीधा फाइनल रिजल्ट पर पहुंच जाता था। ऐसे में पैरेंट्स और टीचर्स का साथ मिला। वे हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाते रहते थे। मुझे यकीन दिलाते थे कि मेहनत जाया नहीं जाएगी और न ही दादा जी का सपना टूटेगा। ड्रॉप इयर से एक और बहुत अच्छी बात सीखी जो जीवन में हमेशा काम आएगा। जीतने से पहले हारना जरूरी है। जो इंसान अपनी हार को स्वीकार करके उसे जीत में बदलने के लिए खड़ा हो जाता है तो उसे जिंदगी की बड़ी से बड़ी मुश्किल भी नहीं हरा सकती।
सचदेवा से मिला पढऩे के लिए मोटिवेशन
दोनों ड्रॉप इयर में सचदेवा कॉलेज से नीट की तैयारी करने वाली डॉ. भारती चंद्राकर ने बताया कि पढऩे के लिए एक स्ट्रांग मोटिवेशन की जरूरत होती है जो मुझे सचदेवा कॉलेज भिलाई से मिला। यहां के टेस्ट सीरिज का लेवल काफी हाई है। हर बार जब टेस्ट सीरिज में टॉप 10 को मंच पर बुलाया जाता था तब उन्हें प्राइज लेते हुए देखकर अपने आप को मंच में खड़ा करने के लिए मन ही मन तैयारी करती थी। मैं सोचती थी कि आज नहीं तो कल उस मंच पर मैं भी खड़े होकर प्राइज लूंगी। कोचिंग के अलावा बाहर के बच्चों के साथ कॉम्पिटिशन करके अपनी तैयारी को परखने का मौका मिलता था। कई बार रैंक कम आने पर कॉन्फिडेंस डाउन हो जाता था तब सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर पर्सनल काउंसलिंग के जरिए मोटिवेट करते थे। उनकी पॉजिटिव बातें और एनर्जी मन मस्तिष्क में डबल एनर्जी का संचार कर देती है। सचदेवा के टीचर्स को बहुत अच्छी तरह पता है कि सिलेबस को कैसे और किस तरह से बच्चों को पढ़ाना है। इसलिए क्लास रूम में कभी डाउट पूछने में झिझक नहीं हुई।
पढ़ाई के साथ सेहत का ख्याल रखो
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से कहूंगी कि पढऩे के साथ-साथ सेहत का ख्याल भी रखना है। कई स्टूडेंट साल भर तैयारी करते हैं और एग्जाम से कुछ दिन पहले बीमार हो जाते हैं। इससे उनके परफार्मेंस पर भी असर पड़ता है। टाइम मैनेजमेंट और रिविजन पर फोकस करें। सबकुछ पढ़ लिया लेकिन रिविजन नहीं किया तो आप एग्जाम में कमजोर पड़ सकते हैं। पढ़ाई के बीच-बीच में ब्रेक जरूर लें। कई बार लगातार पढ़ते रहने से भी मन बोझिल हो जाता है।For English News : the states.news

