- सिर्फ दो जोड़ी कपड़े लेकर घर से निकला था आज छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े हॉस्पिटल में है सीएमओ
- भीड़ में गंदे, बदबूदार कपड़े पहनकर खड़ रहता था, सोचता था एक दिन मेरी बारी भी आएगी
- पढि़ए गरीब बस कंडेक्टर के मेहनती बेटे की डॉक्टर बनने की कहानी
भिलाई(mediasaheb.com) गरीबी अच्छेअच्छों का सपना तोड़ देती है पर खुद को साबित करने की जिद्द ने गांव के एक गरीबी लड़के को आज छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का सीएमओ बना दिया है। महज दो जोड़ी कपड़े लेकर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने पहुंचे डॉ. कमलेश इजरदार के संघर्ष की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। रायगढ़ जिले के छोटे से गांव बरमकेला के एक गरीब परिवार में पैदा हुआ बच्चा जब अपने कंडेक्टर पिता के लिए टिफिन लेकर बस स्टैंड जाता तो लोग मजबूर पिता से कहते थे कि कहीं बेटे को भी तो तुम्हारी तरह बस का कंडेक्टर तो नहीं बनोगे ना। तब पिता बड़े गर्व से कहते थे कि मेरा बेटा या तो कलेक्टर बनेगा या फिर डॉक्टर। पिता की उन्हीं बातों ने बाल मन में इतना गहरा छाप छोड़ा कि कमलेश ने जीवन के हर मोड़ की कठिन परीक्षा पासकर खुद की काबिलियत का लोहा मनवाया। परिवार का पेट पालने क लिए खेतों में काम करने वाले डॉ. कमलेश कहते हैं गरीबी हर दिन परीक्षा लेती थी। पढऩे के लिए कभी पेपर बांटा, तो कभी दूसरे के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया यहां तक कि जब तक सीजी पीएमटी का रिजल्ट नहीं आया तब तक पंचर बनाने का भी काम किया। जिंदगी के इन इम्तिहानों की वजह से ही आज तपकर डॉक्टर बन पाया। यही कारण है कि आज भी खुद को जमीन से जुड़ा हुआ महसूस करता हूं, इसलिए गांव से आने वाले गरीब मरीजों की पीड़ा को ठीक तरह से समझ पाता हूं।
हालात के आगे बेबस था लेकिन नहीं टूटने दिया सपने को
डॉ. कमलेश ने बताया कि उनके घर के आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। बड़ी बहन और भाई ज्यादा पढ़ नहीं पाए। मुझे पढ़ाने के लिए उन्होंने कम उम्र में पढ़ाई छोड़कर काम करना शुरू कर दिया। दसवीं में ब्लॉक में टॉप किया तो स्कूल के प्राचार्य ने बायो की जगह मैथ्स विषय में एडमिशन कर दिया। मैं जिद्द में अड़ गया कि कि बायो लेकर ही पढ़ाई करूंगा। उस वक्त स्कूल में एक भी बायो का टीचर नहीं था। तब मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया। एक दिन प्राचार्य ने पिता जी को स्कूल बुलाया और उनसे पूछा कि लड़का स्कूल क्यों नहीं आ रहा तब पिता जी ने उन्हें पूरी बात बताई। बाद में बायो में एडमिशन लेकर मैंने 12 वीं बोर्ड की परीक्षा दी। बोर्ड परीक्षा के बाद मन में डॉक्टर बनने की इच्छा थी लेकिन पैसों की कमी के कारण कहीं कोचिंग करने नहीं जा पाया। घर में ही रहकर खेतों में काम करता, बीमार मां की घरेलू कामों में मदद करता था। फिर एक दिन मैं घर से दो जोड़ी कपड़ा लेकर बिलासपुर आ गया। यहां साथ में पढऩे वाले और कुछ सीनियर कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे उनके साथ रहा। कुछ दिनों बाद पेट पालने के लिए मैंने पेपर बांटना शुरू किया। खाली टाइम में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता। साथ ही बीएससी की पढ़ाई भी करने लगा। धीरे-धीरे वक्त बीतता गया लेकिन डॉक्टर बनने का सपना मन के किसी कोने में ठहरकर रोज आवाज देता।
ग्रेजुएशन के बाद क्वालिफाई किया पीएमटी
डॉ. कमलेश ने बताया कि हालात के आगे घुटने टेकने की बजाय मैं पढ़ता चला गया। इसी के साथ ग्रेजुएशन भी पूरा हो गया। इसी बीच में सीजी पीएमटी का एग्जाम दिया और 2012 में प्रदेश में 36 वां रैंक हासिल करके रायपुर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। जिस वक्त रिजल्ट निकला उस समय मैं गांव के पंचर दुकान में एक साइकिल का पंचर बना रहा था। दोस्त ने जानकारी दी कि मैं एमबीबीएस के लिए सलेक्ट हो गया तो ऐसा लगा कि मैं आसमान में उड़ रहा हूं। यहां भी गरीबी ने पीछा नहीं छोड़ा जब मेडिकल कॉलेज के फीस भरने की बात आई तो जेब खाली था तब रायगढ़ कलेक्टर ने पहले साल का फीस भरा।
बदबूदार कपड़े पहनकर खड़ा था सबसे पीछे
सीजी पीएमटी की तैयारी के लिए मैं जब पहली बार भिलाई आया तो यहां कोचिंग में बच्चों की भीड़ देखकर डर गया। सचदेवा कॉलेज के द्वारा एक दस हजार रुपए की इनामी प्रतियोगिता कराई थी पीएमटी की तैयारी कर रहे बच्चों के लिए। पेपर में विज्ञापन छपा देखा और सीधे भिलाई आ गया। किसी तरह हिम्मत जुटाकर मैंने भी वो परीक्षा दी। जब रिजल्ट घोषित होने लगे तो हजारों बच्चों की भीड़ में मैं सबसे पीछे खड़ा था। सबसे पहले टॉप 10, 9,8 ऐसे लोगों के नाम बुलाने लगे। जब टॉप 2 में भी मेरा नाम नहीं आया तो मैंने निराश हो गया। कुछ ही देर में मंच से आवाज आई इस प्रतियोगिता के विजेता हैं कमलेश तो मैं हड़बड़ा गया। दो दिन से एक ही कपड़ा पहना था, कपड़ों से बदबू आ रही थी। बाल बिखरे हुए थे, पैरों में मामूली चप्पल थी स्टेज में जाने के लिए मन में बहुत संकोच हो रहा था। किसी तरह हिम्मत जुटाकर पहुंचा तो चिरंजीव जैन सर ने बधाई देते हुए प्रमाण पत्र दिया। उसके बाद मैंने एक साल तक सेल्फ स्टडी की और सचदेवा के टेस्ट सीरिज दिलाने के लिए कोचिंग सेंटर जाता था।
वापस जाने के लिए जैन सर ने दिए थे पांच सौ रुपए
सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की काउंसलिंग और मोटिवेशनल बातें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। मेडिकल कॉलेज में दाखिले के बाद एक दिन मैं ऐसे ही घूमते हुए कोचिंग सेंटर पहुंच गया तो जैन सर ने मुझे पांच सौ रुपए का नोट खुशी में दे दिया। आज भी मैंने वो नोट संभालकर रखा है। मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि हमारे जैसे हजारों अर्जुन पैदा होते हैं लेकिन चिरंजीव जैन जैसा द्रोणाचार्य बेहद विरले हैं। उन्होंने एक गरीब बच्चे को पालक बनकर मार्गदर्शन दिया। इसलिए आज मैं डॉक्टर बन पाया। जो बच्चे नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे कहूंगा कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए सिर्फ मेहनत करो। जब मैं हिंदी मीडियम गांव के स्कूल में पढ़कर, गरीब बस कंडेक्टर का बेटा डॉक्टर बन सकता हूं तो आप क्यों नहीं।

