- पहले अटेम्ट में हासिल किया प्रदेश में 60 वां रैंक, पढऩे के पैसे नहीं थे तब दोस्तों ने बढ़ाया मदद का हाथ
- पांचवीं पास माता-पिता चाहते थे एक दिन बड़ा आदमी बने गरीब का बेटा
भिलाई.(mediasaheb.com) कहते हैं अभाव में प्रतिभा पलती है। गरीबी आदमी को कुछ बनने के लिए प्रेेरित करती है। कुछ ऐसी ही कहानी है धमतरी जिले के छोटे से गांव अंचलपुर के निवासी डॉ. हेमराज देवांगन की। बचपन में गरीबी ने ऐसा सितम ढहाया कि 12 वीं के बाद प्रतिभाशाली छात्र को घर चलाने के लिए मजबूरी में पढ़ाई छोडऩी पड़ी। कभी इलेक्ट्रिशियन बनकर दूसरे के घरों के पंखे ठीक किए तो कभी किराने की दुकान में राशन तौला। पर इन सबके बीच मन में डॉक्टर बनने का सपना पलता रहा। जहां चाह है वहां राह इस बात को जीने वाले डॉ. हेमराज को आखिरकार पढ़ाई छोडऩे के तीन साल बाद बचपन के दोस्तों ने फिर से पढऩे का हौसला दिया। साथ ही उम्मीद की एक ऐसी किरण भी जगाई जिससे डॉक्टर हेमराज का जीवन साकार हो गया। एक साल की कोचिंग और कड़ी मेहनत के बल मे पर गांव के इस होनहार छात्र ने न सिर्फ सीजी पीएमटी क्वालिफाई किया बल्कि पूरे राज्य में 60 रैंक हासिल करके पढ़ाई के लिए अपना पसंदीदा रायपुर मेडिकल कॉलेज भी चुना। आज धमतरी जिले के सरकारी अस्पताल में मेडिकल स्पेशलिस्ट के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
पांचवीं पास माता-पिता चाहते थे बेटा बने बड़ा आदमी
डॉ. हेमराज ने बताया कि उनकी पूरी स्कूलिंग गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से हुई है। परिवार में कोई ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है। पांचवीं पास माता-पिता बचपन से चाहते थे कि मैं अपनी प्रतिभा के दम पर बड़ा आदमी बनूं। तीन साल तक पढ़ाई छोडऩे के बाद जब मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के बारे में उन्हें बताया तो उन्होंने बस इतना ही कहा कि तू अब घर की चिंता मत कर कुछ बनकर ही गांव वापस आना। वो बात दिल पर लग गई, जब कोचिंग में पढऩे का मौका मिला तो किताबें ही मेरी दुनिया बन गई। अपनी मेहनत में कोई कमी नहीं छोडऩा चाहता था इसलिए दिन रात बस सपने को बुनने में लग गया। मेरे बचपन के दो साथी एम्स दिल्ली में हार्ट सर्जन के रूप में काम कर रहे डॉ. गेंद सौरभ साहू और डॉक्टर घनश्याम साहू ने पढ़ाई में काफी मदद की। मुझसे एक साल पहले मेडिकल एंट्रेस क्लीयर करने का उनका अनुभव भी काफी काम आया। उन्हें लगता था कि जब हम एमबीबीएस की सीट हासिल कर सकते हैं तो हेमराज क्यों नहीं। उनकी यही सोच ने मेरे जीवन को बदल दिया और आज मैं सफलता से रूबरू हो पाया।
सचदेवा में जैन सर ने एक साल फ्री में पढ़ाया कोचिंग
सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर के पास जब मैं पहली बार गया तो मेरे दोनों दोस्तों ने उनसे कहा कि सर ये पढऩे वाला लड़का है। आर्थिक स्थिति बहुत खराब है आप इसे फ्री में पढ़ाकर इसकी जिंदगी बदल सकते हैं। जैन सर ने भी बिना देर किए मुझे कोङ्क्षचग में एडमिशन दे दिया। जब कभी मैं निराश होता तो पैरेंट्स की तरह काउंसङ्क्षलग करके सपने को पूरा करने का हौसला देते थे। सचदेवा के टीचर्स परिवार के बच्चे की तरह ख्याल रखते थे। तीन साल के बाद पढ़ाई छोड़कर फिर से नए सिरे से पढऩा काफी चैलेंजिंग रहा लेकिन मैं जानता था कि अगर जिंदगी में ये मौका गंवा दिया तो शायद दूसरा कभी नहीं मिलेगा। इसलिए पढ़ता चला गया और मेरी मेहनत रंग लाई।
किसी प्रतियोगिता में सफल होने के लिए आत्म मूल्यांकन बहुत जरूरी है। सचदेवा के टेस्ट सीरिज के दौरान जब कम नंबर आते थे तब मैं खुद का आत्म मूल्यांकन करता था। अगले टेस्ट में उन गलतियों को सुधारकर बेहतर करने की कोशिश करता था। ग्रामीण परिवेश और हिंदी मीडियम से पढ़ाई के बावजूद अंग्रेजी कभी मेडिकल कॅरियर में बाधा नहीं बनी। मुझे ये लगता है कि अंग्रेजी से सरल कोई भाषा नहीं है। जो बच्चे नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे यही कहूंगा कि अपनी क्षमता पर भरोसा करके नियमित अभ्यास करें। हर टेस्ट को गंभीरता से लें। पढ़े हुए सब्जेक्ट का बार-बार रिविजन करें ताकि पेपर में यदि उससे टच करता हुआ कोई भी सवाल आए तो झट से साल्व हो जाए।

