मेडिकल एंट्रेस की तैयारी जारी रखने बर्तन दुकान में किया काम, आर्थिक तंगी के कारण नहीं जा सका कोचिंग
स्कूल में सोचता था कलेक्टर, एसपी, डॉक्टर, इंजीनियर नहीं बन सकते गांव के लोग
भिलाई.(mediasaheb.com)| अंधविश्वास और पिछड़े ग्रामीण माहौल से निकलकर एक ठेठ ग्रामीण बच्चे ने साबित कर दिया कि मेहनत से दुनिया जीती जा सकती है। चाहे लाख कठिनाई क्यों न आ जाए जीवन में सबकुछ हासिल किया जा सकता है। हम बात कर रहे हैं धमतरी जिले के भीतररात गांव के रहने वाले डॉ. जैनेंद्र कुमार शांडिल्य की। जो बर्तन दुकान में मजदूरी करके, घर में सेल्फ स्टडी करके डॉक्टर बनें। फिल्मी लगने वाली यह कहानी असल जिंदगी में गरीबी और मेहनत की असली परिभाषा गढ़ती है। डॉ. शांडिल्य के पिता पेशे से टीचर थे वे चाहते थे बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बनें। बेटा बचपन में ग्रामीण माहौल में रहकर सोचता था कि डॉक्टर, कलेक्टर, एसपी, इंजीनियर गरीब गांव के लोग नहीं बन सकते। ये जॉब उनके लिए नहीं होता। बाद में पिता जी ने बेटे को समझाया और मेडिकल एंट्रेस की तैयारी की सलाह दी। डॉ. शांडिल्य ने बताया कि 12 वीं के बाद एक साल तो ये डिसाइड करने में लग गया कि आखिर मेडिकल फील्ड में जाना है कि नहीं। जब डिसाइड किया तब तक साल निकाल गया था। संयुक्त परिवार में रहने वाले पिता ने अगले साल किसी तरह कुछ पैसों का जुगाड़ करके कोचिंग के लिए भिलाई भेजा। यहां भी दो साल ड्रॉप के बाद असफलता हाथ लगी। अंत में आर्थिक तंगी के कारण कोचिंग छोड़कर वापस गांव लौटना पड़ा और परिवार की मदद के लिए बर्तन दुकान में मजदूरी करने लगा। इस दौरान मैंने हार नहीं मानी और कोचिंग के स्टडी मटेेरियल के साथ घर पर ही सेल्फ स्टडी करने लगा। जब सीजी पीएमटी 2011 का रिजल्ट आया तब मैं बर्तन दुकान में काम कर रहा था। किसी दोस्त ने बाहर से आवाज देकर बताया कि तेरा सलेक्शन हो गया। उसकी बात सुनकर मेरे पांव जमीन पर नहीं रहे।
आज नारायणपुर जैसे घोर माओवाद प्रभावित क्षेत्र में एक डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा करके अजीब सी शांति महसूस होती है। लगता है कि अगर पिता ने साहस नहीं जुटाया होता तो शायद मैं गांव की गलियों में कहीं खो जाता।
भिलाई में आते ही हावी हो गई थी हीन भावना
डॉ. शांडिल्य ने बताया कि उन्हें 12 वीं के बाद सफलता के लिए चार साल तक इंतजार करना पड़ा। मुझे अच्छी तरह याद है जब पहली बार मैं कोचिंग करने के लिए भिलाई आया तो यहां के बच्चों को देखकर हीन भावना से ग्रसित हो गया था। मैं खुद को उनसे कमतर मानने लगा था। इसलिए पहले साल तो चीजों को समझने में निकल गया। दूसरे साल जब कान्फिडेंस आया तो महज तीन नंबर से क्वालिफाई करने से चूक गया। तीसरे साल कोचिंग में एक बार और तैयारी करना चाहता था लेकिन आर्थिक तंगी के कारण ये संभव नहीं हो सका और फिर गांव में ही रहकर काम करते हुए सेल्फ स्टडी करने का फैसला किया। जब मैं बर्तन दुकान में काम करता था तो कई लोग कहते थे देखो कहां ये डॉक्टर बनने वाला था आज बर्तन दुकान में काम कर रहा है। डॉक्टरी हर किसी के बस की बात नहीं। इन बातों को मैं अनसुना कर देता था कि क्योंकि जानता था कि मेरी मजदूरी के पैसे परिवार के लिए कितने जरूरी है।
संघर्ष के दिनों में सचदेवा का नोट्स बना संजीवनी
दो साल सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज में कोचिंग करने वाले डॉ. शांडिल्य ने बताया कि सेल्फ स्टडी और संघर्ष के दिनों में सचदेवा का नोट्स उनके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं था। यही कारण है कि घर में पढ़कर मैं सफल हो पाया। शुरुआत में कैमेस्ट्री बहुत ज्यादा टफ लगता था लेकिन सचदेवा के टीचर्स ने सभी विषयों की ऐसी तैयारी कराई थी जो तीसरे साल भी मेरे काम आया। अगर मैं सचदेवा नहीं आता तो शायद हीन भावना से कभी निकल नहीं पाता। यहां के टीचर्स हर बात पर मोटिवेट करते थे वे कहते हैं कि मेहनत से हर मंजिल पाई जा सकती है। लोग अपनी किस्मत बदल देते हैं। मैं भी उन्हीं चंद लोगों में हो जिसके पास मेहनत के अलावा कुछ भी नहीं था। एक बार घर की परेशानी को लेकर सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर के सामने मैं बहुत इमोशनल हो गया था। तब उन्होंने समझाया कि तुम डॉक्टर बनकर हर किसी की परेशानी दूर कर सकते हो इसलिए सिर्फ पढ़ाई करो बाकी बातों के बारे में मत सोचो। उनकी काउंसलिंग ने मुझे संघर्ष करने की हिम्मत दी थी।
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले स्टूडेंट्स से कहना चाहता हैं कि एग्जाम में आपका बैकग्राउंड मायने नहीं रखता। हम दूसरे स्टूडेंट्स को देखकर ये सोचते रहते हैं कि मैं गांव से आया हूं, हिंदी मीडियम से हूं, अंग्रेजी नहीं आती और यही सोचकर डिप्रेशन में चले जाते हैं। सच तो ये है मेडिकल एंट्रेस में सिर्फ हार्ड वर्क मायने रखता है। बाकी सारी बातें कोरी साबित होती है। इसलिए काम्पिटिशन के लिए खुद को पहले मानसिक रूप से तैयार करें फिर कड़ी मेहनत करें सफलता जरूरी मिलेगी।


