बिलासपुर (mediasaheb.com)| शशि कपूर पुण्यतिथि
शशि कपूर और उनका कलात्मक सिनेमा फिल्म ‘उत्सव'(1984) हिन्दी सिनेमा मे भारत के गौरवशाली अतीत का स्वर्णिम प्रस्तुतीकरण..
शशि कपूर जी ने अपने पूरे फ़िल्मी कैरियर मे अधिकांश मसाला फिल्मों मे ही अभिनय किया,किन्तु ज़ब निर्माण या निर्देशन या अभिनय का मौका मिला तो उन्होंने हिन्दी सिनेमा को बहुत ही कलात्मक फिल्मों से समृद्ध किया, यही वो श्रेष्ठ सिनेमा है जो उन्हें अमरता प्रदान करेगा.. आप फ़िल्म ’36 चौरंगी लेन’ या श्याम बेनेगल की फ़िल्म ‘जूनून’ जो 1857 की पृष्ठभूमि पर बनी थी या कलात्मक फ़िल्म ‘शेक्सपियर वाला’… वे और उनकी पत्नी आजीवन थिएटर यानि रंगमंच को समर्पित रहें, मुंबई स्थित पृथ्वी थिएटर में उन्होंने अनेक नाटको में उत्कृष्ट अभिनय किया , हिन्दी नाट्य विधा को जीवंत रखने और उस में नव प्रयोग करने उन्हें हमेशा स्मरण किया जाएगाआज मै उनकी बेहतरीन फ़िल्म,’उत्सव’ को याद कर रहें है |
फ़िल्म उत्सव,शूद्रक कृत संस्कृत की महान नाट्य कृति ‘मृच्छकटिकम् ‘ पर बनी थी, यह नाट्य विश्व की सभी प्रमुख भाषाओ में अनुवादित है, हजारो वर्ष पूर्व का उज्जैन , रासरंग वैभव और समृद्धि से परिपूर्ण सुसंस्कृत नगर व उसका उतना ही मुक्त समाज … ऋषि वात्सायन का कामशास्त्र ,खजुराहो की मूर्तियों में समाया सेक्स,सेक्स हमारे समाज में वर्जित नहीं था ,वो सहज जीवन का हिस्सा था, वो श्रेष्ठ भारत का समृद्ध समाज,आज के भारतीय समाज से मेल नहीं खाता,उस काल का भारत यानि अति संपन्न देश जहाँ चारो ओर वैभव बिखरा पड़ा है, रूढ़ीयो से मुक्त समाज
रेखा ने नगरवधू वसंतसेना का यादगार अभिनय किया,वे उज्जैन की सुन्दरतम नगरवधू है, उनका सम्मान राजपरिवार के सदस्यों के समकक्ष है,चारुदत्त , सेनापति (शशि कपूर) और विदुषक ..एक महान संस्कृत नाट्य को गढ़ते है, इस मे अमज़द खान ऋषि वात्स्यायन की भूमिका मे है काम शाश्त्र का सुंदरतम चित्रांकन,जीवन का उत्सव , काम का उत्सव , प्रेम का उत्सव …. रेखा ,वसंतसेना के रूप में साक्षात् खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई नायिका लगती है, स्वर्ग लोक से धरा पर अवतरित मानो कोई देवकन्या..चारुदत्त की भूमिका मे थे शेखर सुमन फ़िल्म ‘उत्सव’ का ये मनभावन गीत….

मन क्यों बहका री बहका, आधी रात को बेला महका री महका, आधी रात को
किस ने बन्सी बजाई, आधी रात को जिस ने पलकी चुराई, आधी रात को
झांझर झमके सुन झमके, आधी रात को उसको टोको ना रोको, रोको ना टोको, टोको ना रोको, आधी रात को
लाज लागे री लागे, आधी रात को देना सिंदूर क्यों सोऊँ आधी रात को
बात कहते बने क्या, आधी रात को आँख खोलेगी बात, आधी रात को
हम ने पी चाँदनी, आधी रात को चाँद आँखों में आया, आधी रात को
रात गुनती रहेगी, आधी बात को आधी बातों की पीर!, आधी रात को
बात पूरी हो कैसे, आधी रात को रात होती शुरू हैं, आधी रात को … 

*डॉ. संजय अनंत ©*


