राजेश खन्ना (पुण्यतिथि 🌹)
बिलासपुर (mediasaheb.com), एक दौर था ,जब राजेश खन्ना होने का मतलब ही सुपर हिट फिल्म होता था, एक सामान्य परिवार से आने वाला युवा, कैसे अपनी प्रतिभा से पूरे देश के उस दौर के युवाओं का पसंदीदा एक्टर बन जाता है, आप भाग्य कह सकते है, करिश्मा कह सकते है, पर उनकी स्टाइल, उनके अभिनय का अनोखा अंदाज़ उन्हें आपार लोकप्रियता दे गया उस दौर में लड़कियां ब्लेड से अपने हाथो पर उनका नाम लिखती थी, उनकी फोटो से ब्याह रचाती थी उफ़ क्या दौर था साहब सिर्फ और सिर्फ राजेश खन्ना..
आराधना ,कटी पतंग , अनुरोध , आप की कसम मुझे प्रिय है किंतु उनकी अभिनीत सर्वश्रेष्ठ फिल्म है आनंद, जीवन का फलसफा पर्दे पर उतारा गया, ये फिल्म जब भी देखी जीवन के प्रति सकरात्मकता का भाव जागृत हुआ
अमिताभ उन दिनों नए अभिनेता माने जाते थे और उनके साथ थे उस ज़माने के सुपर हीरो राजेश खन्ना अमिताभ जी ने अपने संस्मरण में कहा उन दिनों उनके परिचित उनसे राजेश जी के बारे में पूछते ( इतने बड़े स्टार के साथ जो काम मिला था ) एक व्यक्ति जिसे अपनी मृत्यु का एहसास पहले से हो और वो जीवन में सकारात्मकता बाटता चले…राजेश खन्ना व अमिताभ के बीच जीवन की कश्मकश, एक डॉक्टर को अपनी सीमितता का एहसास …जीवन को समझने का प्रयास, ‘तो बाबू मोशाय जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए ‘ वो आदर्शवादी डॉ भास्कर बेनर्जी यानि अमिताभ अपने चेहरे की भाव भंगिमा से मानो संवाद करते है, डॉक्टर रोज़ मृत्यु और जीवन के संघर्ष को करीब से देखते है, किंतु भाव में उदासिनता आ जाती है , डॉ भास्कर बेनर्जी ( अमिताभ ) भी एक डॉक्टर है जानता है कि उसके दोस्त का बचना असंभव है यहाँ प्रोफेशन के ऊपर भावनाएं हावी हो जाती है डॉक्टर होम्योपैथिक ,बाबा की भभूत की बात करने लगता है। इस फ़िल्म में अमिताभ यानि भास्कर बेनर्जी एक कविता पढ़ते है, अमिताभ की आवाज़ में सुनिए, बहुत प्रभावी लगती है, दिल को छू जाती है ..
मौत तू एक कविता है मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आए मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको
संजय अनंत ©


