दरभंगा
सेब-केसर की धरती जम्मू-कश्मीर में अब मिथिला का मखाना मेहमान बनेगा। इसकी खेती के लिए एक साल से काम हो रहा है।
दरभंगा स्थित राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र और शेर ए कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर (स्कास्ट-के) के बीच पिछले वर्ष सात अक्टूबर को राष्ट्रीय मखाना महोत्सव के दौरान समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे।
यह दोनों संस्थानों के बीच वैज्ञानिक सहयोग और मखाना उत्पादन तकनीक के प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण है। समझौते पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नजीर अहमद गनई और अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. नचिकेत कोतवालीवाले ने हस्ताक्षर किए थे।
सहयोग को आगे बढ़ाते हुए जम्मू-कश्मीर में मखाना उत्पादन और इसके विस्तार के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में संस्थान के वरीय विज्ञानी डॉ. आइएस सिंह ने कश्मीर के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बांडीपोरा-वन का दौरा किया है।
इससे स्थानीय कृषि विज्ञानियों के साथ तकनीकी संवाद और आगे की कार्ययोजना को गति मिली है। साथ ही, जम्मू-कश्मीर के कृषि विभाग के अनुरोध पर वरीय विज्ञानी डॉ. मनोज कुमार के नेतृत्व में चार सदस्यीय विशेषज्ञ दल नवंबर या दिसंबर में जम्मू-कश्मीर का दौरा करेगा।
वहां के किसानों को मखाना उत्पादन की तकनीक, जल एवं मृदा परिस्थिति, खेती की संभावना और फसल प्रबंधन पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। कृषि व संबंधित अधिकारियों को भी जागरूक करने की योजना है।
समय-समय पर प्रशिक्षण और कृषि सामग्री का वितरण
दरभंगा अनुसंधान केंद्र के प्रयास से 10 राज्यों में मखाने की खेती के विस्तार की दिशा में कार्य किया जा रहा।
हाल में असम, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बंगाल और झारखंड सहित विभिन्न राज्यों के किसानों एवं उद्यमियों को मखाना उत्पादन और प्रसंस्करण का प्रशिक्षण दिया गया है।
समय-समय पर वहां से आए किसानों को जाले कृषि विज्ञान केंद्र और ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण कराकर तकनीकी पक्षों से अवगत कराया गया है।
इसके अलावा, यह केंद्र बिहार के प्रमुख मखाना उत्पादक जिलों मधुबनी, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, सीतामढ़ी आदि के स्थानीय एवं अनुसूचित जाति के किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण और कृषि सामग्री वितरित करता है।
उन्नत प्रभेद स्वर्ण वैदेही की खेती की तैयारी, किसानों की बढ़ेगी आय
कश्मीर में मखाना अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित मखाने के उन्नत प्रभेद स्वर्ण वैदेही को स्थानीय परिस्थितियों में परीक्षण एवं प्रदर्शन के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। डॉ. मनोज कुमार का कहना है कि देश के अनेक क्षेत्रों में मखाना उत्पादन के विस्तार की पर्याप्त संभावनाए हैं।
संस्थान खेती के राष्ट्रव्यापी विस्तार पर लगातार काम कर रहा। उन राज्यों की प्राथमिकता है, जहां मृदा, जलवायु और जल की उपलब्धता अनुकूल हैं। वहां तकनीक, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, तकनीकी सहायता और किसानों के प्रशिक्षण के माध्यम से खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है।
अगले 10 वर्षों में यदि भारत के विभिन्न प्रांतों में उपलब्ध जल संसाधन और उपयुक्त जल क्षेत्रों का वैज्ञानिक एवं टिकाऊ उपयोग किया जाए तो मखाने की खेती का क्षेत्र बढ़कर चार लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकता है।
इससे किसानों की आय और ग्रामीण रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन को भी प्रोत्साहन मिलेगा। घरेलू और वैश्विक बाजार में भारतीय मखाने की उपलब्धता और प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होगी।


