संजय अनंत-आशापूर्णा देवी (पुण्यतिथि)
*’मैं तो सरस्वती की स्टेनो हूँ’*
बिलासपुर (mediasaheb.com), बांग्ला कथा साहित्य निश्चित ही सौभाग्यशाली है, समृद्ध है क्यों की उनके पास शरत बाबू, आशापूर्णा देवी, बिमल मित्र और ताराशंकर जैसे जनलेखक है,जिनकी लेखनी ने आम जन को साहित्य से जोड़ा…. मै याद कर रहा हु,आशापूर्णा देवी जी को ज्ञानपीठ सम्मान पाने वाली पहली महिला साहित्यकार , 250 से अधिक उपन्यास..
*स्त्री जीवन का सच और उसका यथा रूप प्रस्तुतीकरण ही उनका सृजन है…*
उनका साहित्य लिखना, घर में अनेक बंदिशों के बाद भी, घर की खिड़कियों से बाहर झाँकने का प्रयास, संसार को अपनी कल्पना से समझने का प्रयास..
वे इस तर्क को शक्ति प्रदान करती है, यदि लक्ष्य के प्रति सर्वस्व समर्पण हो तो वो मिलता ही है
जिस घर में जन्मी,वहाँ कला संस्कृति के लिए जगह थी,साहित्य, चित्रकला के संस्कार थे किन्तु वो आज का भारत नहीं था, एक्र कुलीन बंगाली परिवार की लड़की के लिए सब कुछ आसान नहीं था, लड़की भला कैसे बाहर पढ़ने जाएगी?? कल्पना से बाहर की बात उन दिनों, उनकी रूचि थी पर घर से बाहर किसी स्कूल में दाखिला किसी लड़की के लिए संभव नहीं था
विवाह के बाद भी कुछ नहीं बदला, ससुराल में वे कुलीन परिवार की बहु थी, वहाँ भी परदा, घर में ही रहने की मज़बूरी..
उनकी लेखनी से निकला कालजयी अमृत है प्रथम प्रतिश्रुति जिस के लिए उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान मिला और इसी कड़ी में सुवर्णलता और फिर बकुल कथा
उनको अपनी प्रतिभा के कारण उन्हें समकालीन बांग्ला उपन्यासकारों की प्रथम पंक्ति में गौरवपूर्ण स्थान मिला। उनके लेखन की विशिष्टता उनकी एक अपनी ही शैली है, कथा का विकास, चरित्रों का रेखाकंन, पात्रों के मनोभावों से अवगत कराना, सबमें वह यथार्थवादिता को बनाए रखते हुए अपनी आशामयी दृष्टि को अभिव्यक्ति देती हैं। इसके पीछे उनकी शैली विद्यमान रहती है। वे यथार्थवादी, सहज और संतुलित थी। सीधे और कम शब्दों में बात को ज्यों का त्यों कह देना उनकी विशेषता थी। उनकी निरीक्षण शक्ति गहन और पैनी थी और विचारों में गंभीरता थी। पूर्वाग्रहों से रहित उनका दृष्टिकोण अपने नाम के अनुरूप आशावादी था। वे मानवप्रेमी थी। वे विद्रोहिणी थी
इस विलक्षण प्रतिभा को शत शत नमन 🙏


