बिलासपुर (mediasaheb.com)| आप वीर सावरकर की सोच समझ सिद्धांत से सहमत है या असहमत किन्तु इस फ़िल्म को इसलिए अवश्य देखे की स्वतंत्रता के पश्चात हमें विचारधारा विशेष का इतिहास पढ़ाया गया और बहुत सारा सच इतिहास की पुस्तकों से गायब कर दिया गया
ये फ़िल्म कही भी आप को मनोरंजन नहीं देगी , तो इस उम्मीद के साथ इसे देखने टिकट और पोपकॉर्न ले थिएटर में प्रवेश न करें किन्तु ये आप को झकझोर देगी, एक्टिंग तो कही है ही नहीं रणदीप हुड़्डा का जूनून है, सावरकर का पुनर्जन्म है रुपहले परदे पर, जो सावरकर को डरपोक या माफ़ी मांगने वाला कहते है, कालापनी में उस रोंगटे खड़े करने वाले अत्याचार को शायद एक दिन तो दूर एक घंटा भी न सह पाए…
अभी करोना आया और पर उस दौर में ज़ब प्लेग आया था तब अंग्रेज़ों की हुकूमत थी, पुणे जहां इसका प्रबल प्रकोप था इलाज के स्थान पर कैसे निर्दयता से रोगियों का संहार किया उन्हें प्रताड़ित किया, ये स्वतंत्रता की क़ीमत देश में बहुतेरे समझ नहीं रहे
फिर फ़िल्म आप को रूबरू करवाती है हमारे क्रांतकारी बलिदानियों से चापेकार बंधु से लन्दन में श्यामा जी वर्मा के इंडियन हॉस्टल में रह रहे क्रांतिकारियों से, मदनलाल ढींगरा का बलिदान
सावरकर की अमर कृति ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’,जिसे अंग्रेज़ विद्रोह का बारूद समझते थे, उसे पढ़ना, अपने पास रखना भी जुर्म था
फ़िल्म सावरकर के पूरे जीवन को दर्शाती है, इस फ़िल्म में गाँधी जी भी है, पर इस फ़िल्म में गाँधी जी, नेहरू निश्चित ही आप को खलनायक ही लगेंगे, उस दौर के न्यूज़ पेपर को परदे पर दिखाया गया है, जिस में कांग्रेस गाँधी व नेहरू के हमारे क्रान्तिकारियो को कायर या आतंकवादी करार देते व्यक्तव्य है
इस फ़िल्म को देखना उस पीड़ा को सहना है जो सावरकर ने काला पानी में सही
मैडम कामा का भी जिक्र है, जिन्होंने प्रथम वन्देमातरम अंकित भारतीय ध्वज़ विदेश में लहराया था
पुरानी ब्रिटिश न्यूज़ फिल्मों का भी बखूबी प्रयोग किया गया है, उस दौर को जीवंत करने कई भव्य सेट भी लगाए गए है
इस फ़िल्म में सभी कलाकारों ने पात्रों के साथ न्याय किया है, सावरकर जी की पत्नी के रूप में अंकिता लोखंडे ने सहज अभिनय किया है, जो अंग्रेज़ पात्र है वे भी उस दौर के ब्रिटिश अधिकारी लगते है,कहीं भी ओवर एक्टिंग नहीं है
गाँधी जी व सावरकर के मध्य जो वार्तालाप के संवाद है वे बहुत ही जानदार है, उनकी वैज्ञानिक,यथार्थ वादी सोच के समक्ष इस फ़िल्म में आप को गाँधी जी गलत लगेंगे
इस तरह की फ़िल्म में संगीत रोमांस की कोई गुंजाईश नहीं होती
ये फ़िल्म आप को गाँधी जी के पूर्व के उस दौर में ले जाएगी जिस के विषय में हम कम ही जानते है, तिलक जी, गोखले जी, जिन्ना इत्यादि का दौर यानि 1918 के पहले का भारत
फ़िल्म की जान है रणदीप हुड़्डा..
ये फ़िल्म व्यवसाय करें या न करें किन्तु वे इस फ़िल्म में अपने उत्कृष्ठ अभिनय से अमर हो गए
तो अंत में इतना कहूंगा, फिल्मे आप मनोरंजन के लिए हमेशा देखते है, इस बार देश का सच्चा इतिहास समझने देख लीजिये, यदि आप के बच्चे बड़े हो गए हो यानि आयु बारह वर्ष से ज्यादा है, तो उन्हें भी दिखाए
इस प्रकार की फ़िल्म भले ही सुपर हिट न हो पर चले अवश्य ताकि फिर कोई हुड़्डा इस तरह की ह
फ़िल्म बनाने की हिम्मत करें
अपनी तरफ से दस में दस
*संजय अनंत©*
Tuesday, May 19
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