पहले साल सलेक्शन नहीं हुआ तो हो गई डिप्रेशन की शिकार, लगता था छोड़ दू पढ़ाई
भिलाई(mediasaheb.com)बेमेतरा की रहने वाली डॉ. नेहा राठी बचपन से डॉक्टर बनना चाहती थीइसलिए बहुत छोटी उम्र से ही उन्होंने डॉक्टर बनने की प्रक्रिया की जानकारी जुटानी शुरू कर दी थीपिता का भी सपना था कि बेटी बड़ी होकर डॉक्टर बने इसलिए हर वक्त वो बेटी को मेहनत करने की सीख देते थे। कहते हैं बिना संघर्ष के कोई मुकाम हासिल नहीं होता कुछ ऐसा ही हुआ नेहा के साथ, जब उसने मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू की पहले साल बेसिक कमजोर होने के कारण कोचिंग में टेस्ट में अच्छे नंबर नहीं आते थे। आत्मविश्वास की कमी के चलते पढ़ा हुआ सबकुछ भूला-भूला लगता था। दिमाग में हर पल ये बात हावी रहता था कि अगर सलेक्शन नहीं हुआ तो क्या करूंगी। इसी उधेड़बुन में नेहा मेडिकल एंट्रेस क्वालिफाई करने से चूक गई। डेंटल की सीट मिली लेकिन वो मंजूर नहीं था। असफलता दिमाग में इस कदर हावी थी कि कुछ महीनों तक डिप्रेशन की शिकार हो गई। इसी बीच एक दिन पापा ने समझाते हुए कहा कि जब आंखों में अरमान लिया, मंजिल को अपना मान लिया है मुश्किल क्या, आसान क्या, जब ठान लिया तो ठान लिया। यह सुनकर मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और दूसरी कोशिश के लिए पूरे मन से तैयार हो गई। दूसरे ड्रॉप में ऐसी जीतोड़ मेहनत की सीधे साल 2012 में सीजी पीएमटी क्वालिफाई करके ही दम लिया। रायपुर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के वक्त पापा ने एक ही बात कही थी कि जो भी करना जीवन में दिल लगाकर करना, सफलता जरूर मिलेगी।
रैंक अच्छा नहीं आता था, रोती थी कमरे में बैठकर
डॉ. नेहा ने बताया कि उनकी स्कूली एजुकेशन बेमेतरा में हुई। स्कूल के दिनों में बायो विषय लेकर आगे जरूर बढ़ गई लेकिन बेसिक क्लीयर नहीं हो पाया। जब मेडिकल एंट्रेस की तैयारी करने भिलाई पहुंची तो यहां सबसे बड़ी दिक्कत भी बेसिक ही बना। फिजिक्स को पढ़ते वक्त डर लगता था। कैमेस्ट्री भी बेसिक नॉलेज क्लीयर नहीं होने के कारण टफ लगता था। मैंने हार नहीं मानी टेस्ट में रैंक पीछे आता तो कमरे में बैठकर रोती लेकिन पढऩा नहीं छोड़ा। यही कारण है कि धीरे-धीरे ही सही मैंने खुद को प्रतियोगिता के लिए तैयार करना सीखा। जब ज्यादा निराश होती तो पापा से बात कर लेती थी।
सचदेवा को मेडिकल एंट्रेस के लिए चुनने का सबसे बड़ा रीजन घर के पास होना था। मैं घर से दूर जाकर पढ़ाई नहीं करना चाहती थी। शुरूआत में भिलाई में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। जब पहले साल ड्रॉप में सलेक्शन नहीं हुआ तो मैं दूसरे साल ट्राई तक नहीं करना चाहती थी। ऐसे में सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव सर ने मेरी कई बार काउंसलिंग की। उन्होंने कहा कि सफलता के इतने नजदीक पहुंचकर हार मानना खुद से बेइमानी है। तुम्हारे अंदर क्षमता है तभी तो डेंटल तक पहुंच गई, एमबीबीएस इससे सिर्फ एक कदम दूर है। उनकी बातें सुनकर दूसरे साल मन लगाकर पढ़ाई की। सचदेवा के टीचर्स यहां के स्टाफ ने बहुत मदद की। यहां के फ्रेंडली और खुशनुमा माहौल में धीरे-धीरे पढऩे में मजा आने लगा। हर दिन टीचर्स मोटिवेट करते थे कि तुम कर सकते हो। यही सुनते-सुनते आखिरकार सलेक्शन हो गया।
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट से कहना चाहती हूं कि रैंक पीछे आने या नंबर कम आने के डर से टेस्ट से भागना नहीं चाहिए। ये टेस्ट ही होता है जो आपको बताता है कि आपकी तैयारी में कहां-कहां कितनी कमी है। इसलिए इसे एक चैलेंज की तरह लेकर इसका सामना करना चाहिए। गलतियों को दोहराने की बजाय उनसे सीख लेकर आगे बढ़ें। हमेशा सकरात्मक सोच के साथ रहे, लोग दुनियाभर की बातें करते हैं ऐसे लोगों से दूरी बनाकर केवल अपने टीचर्स और परिवार पर भरोसा करें।(For English News : thestates.news)

