संवेदनशील मन और देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत से डॉक्टर ने पहनी सेना की वर्दी
भिलाई (mediasaheb.com) | अस्पताल में आम मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टर्स की कहानियां तो आपने खूब पढ़ी पर आज हम आपको एक ऐसे डॉक्टर से रूबरू करवा रहे हैं जिनके जिम्मे नक्सल मोर्चे पर तैनात छत्तीसगढ़ पुलिस के स्पेशल कमांडो को फिट रखने की बड़ी जिम्मेदारी है। पेशे से डॉक्टर और कर्म से फौजी डॉ. अमित चंद्राकर एसटीएफ(छत्तीसगढ़ पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स) के जवानों को मैंटली और फिजिकली माओवादियों के खिलाफ स्पेशल ऑपरेशन में लडऩे के लिए तैयार करते हैं। दुर्ग निवासी डॉ. चंद्राकर कहते हैं वे बचपन से डॉक्टर बनना चाहते थे इसलिए शुरूआत से ही मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू कर दी। स्कूल के टॉपर स्टूडेंट होने के बावजूद पीएमटी में तीन बार असफलता मिली। तीसरे ड्रॉप में फाइनली कड़ी मेहनत के बाद साल 2003 में पीएमटी क्वालिफाई किया। डॉक्टरी की पढ़ाई के साथ-साथ मैं देश के लिए कुछ अलग भी करना चाहता था। जब भी आर्मी, पैरामिलिट्री और पुलिस के जवानों को देखता तो लगता कि काश मैं भी इनका हिस्सा बनकर देश की सेवा कर सकूं। इसलिए जब एसटीएफ से जुडऩे का मौका मिला तो तुरंत हामी भर दी। डॉक्टर होने के बाद भी आम जवानों की तरह कड़ी ट्रेनिंग और मैंटल चैलेंज से गुजरना पड़ा। वर्दी पहनकर जब पहली पोस्टिंग में गया तो वो पल मेरे जीवन का सबसे गौरवान्वित करने वाला पल था। आम डॉक्टर से अलग फौज के डॉक्टर को ज्यादा जिम्मेदार और डिसिजन मेकिंग होना पड़ता है, क्योंकि समय कम और कैजुअल्टी को ट्रीट करने का चैलेंज ज्यादा रहता है। साथ ही जवानों को मुश्किल परिस्थितियों में भी कैजुअल्टी और खुद के उपचार की ट्रेनिंग भी देनी पड़ती है। क्योंकि जहां ऑपेरशन चल रहा है वो बीहड़ जंगल है। वहां से अस्पताल पहुंचने में जवान को एक दिन का समय लग जाता है। ऐसे में मुश्किल हालात में जवान ही डॉक्टर और सोल्जर दोनों होता है।
बार-बार असफलता से हो गया था निराश
डॉ. चंद्राकर ने बताया कि उनका पूरा परिवार मेडिकल बैकग्राउंड से है। इसलिए सफल होने के अलावा उनके पास कोई दूसरा ऑप्शन भी नहीं था। 11 वीं जब बायो लेकर पढ़ाई शुरू की तो साथ-साथ मेडिकल एंट्रेस की किताबें भी पढ़ता था। बोर्ड के बाद ड्रॉप लेकर पढऩा का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा, क्योंकि बार-बार असफलता से मैं बहुत ज्यादा निराश हो गया था। घर में सब डॉक्टर है इसलिए सक्सेस होने का प्रेशर भी हावी था। पहले ड्रॉप में रैंक पीछे आया तब पैरेंट्स ने सेकंड ड्रॉप के लिए कहा। जब सेकंड ड्रॉप में भी सलेक्शन नहीं हुआ तब मैंने खुद से तीसरे ड्रॉप के लिए हिम्मत जुटाई। लगातार तीन साल एक ही सिलेबस की पढ़ाई करके पीछे मुडऩा खुद के साथ नाइंसाफी लगी। अपने हौसले को बुलंद करते हुए खुद को मोटिवेट किया। जब रिजल्ट आया तो अपने साथ ढेर सारी खुशियां भी लेकर आया। बिलासपुर मेडिकल कॉलेज का पहला दिन आज भी सपने जैसा लगता है।
सचदेवा का टेस्ट सीरिज सबसे ज्यादा फायेदमंद रहा
डॉ. चंद्राकर ने बताया कि उनके परिवार के कई लोग सचदेवा कॉलेज भिलाई में पढ़कर एमबीबीएस के लिए सलेक्ट हुए थे। इसलिए मैंने भी कोचिंग के लिए सचदेवा कॉलेज को चुना। यहां का टेस्ट सीरिज मेरी पढ़ाई में सबसे ज्यादा मददगार साबित हुआ। जब भी टेस्ट में रैंक कम आता था तब मैं नए चैलेंज के रूप में उसे स्वीकार करके दोगुनी मेहनत करता। यहां के टीचर्स के नॉलेज का लेवल भी बहुत हाई है। सलेक्टिव स्टडी मटरेयिल और पैटर्न की सही समझ का लाभ स्टूडेंट्स को मिलता है। सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर तो अपने आप में अमेजिंग पर्सन है। उनकी मोटिवेशनल बातें सुनकर न पढऩे वाला बच्चा भी रेस में दौडऩे के लिए तैयार हो जाता है। वो हमेशा कहते थे कि रेस में दौडऩा ही काफी नहीं है खुद को साबित भी करना है।
अपने लक्ष्य पर अडिग रहना जरूरी
एसटीएफ में जुडऩे से पहले निकुम ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के रूप में सरकारी अस्पताल में सेवा दे चुके डॉ. अमित कहते हैं किसी भी एग्जाम में सफल होने के लिए अपने लक्ष्य पर अडिग रहना बहुत जरूरी है। कई बार लोग ड्रॉप इयर बढ़ रहा है परिवार का प्रेशर है ये सोचकर अपना साल खराब कर लेते हैं। ऐसे में स्टूडेंट को पता होना चाहिए कि उसे कहां जाना है, क्या करना है। हर टॉपिक का बार-बार रिविजन भी करें। एग्जाम से पहले रिविजन ही वो की है जो आपकी सफलता का ताला खोल सकती है। खुद पर भरोसा रखें। (the states. news)

