छत्तीसगढ़ के छोटे से शहर से पढ़कर कैंसर स्पेशलिस्ट बनी डॉ. सफलता
भिलाई (mediasaheb.com)| बचपन की सहेली के पिता को कैंसर से जूझते
देखकर दुर्ग की नन्हीं सफलता ने मन ही मन तय कर लिया था कि अगर जीवन में कुछ बनना
है तो वो है डॉक्टर। अपनी इसी सोच को आकार देने के लिए बहुत कम उम्र में उसने
किताबों से दोस्ती कर ली। लोग जब गर्मियों में घूमने जाते तो सफलता किताबों की एक
अलग ही दुनिया में खोई रहती, क्योंकि उसे लगता था कि किसी को नई जिंदगी देने के लिए पढऩा
बहुत जरूरी है। 12 वीं बोर्ड के बाद एक साल ड्रॉप लेकर सफलता ने मेडिकल एंट्रेस की
तैयारी की। साल 2000 में एमपी पीएमटी क्वालिफाई करके मेडिकल कॉलेज पहुंच गई। वक्त
बीतते चला गया सफलता के नाम के आगे अब डॉक्टर लग गया, लेकिन पढऩे का जुनून कम नहीं हुआ। कैंसर
जैसी घातक बीमारी से लोगों को बचाने के लिए सफलता ने एक बार फिर कड़ी मेहनत की और
डीमी ओंकोलॉजी की पढ़ाई करके आज देश की राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पताल में
कैंसर स्पेशलिस्ट बनकर लोगों को नया जीवन दे रही है। डॉ. सफलता बघमार कहती हैं कि
अपने सपनों को सफल बनाने के लिए इंसान को बातों से नहीं रातों से लडऩा पड़ता है।
इस दुनिया में अगर हम एक मकसद लेकर आए हैं तो उस मकसद को पूरा करने के लिए कोशिश
तो जरूर करनी चाहिए। मैंने बहुत छोटी उम्र में अपने दिल के करीब रहे अंकल को
बीमारी से ज्यादा बीमारी के जानकारी के अभाव में जूझते हुए देखा था। इसलिए तय कर
लिया था कि कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करूंगी।
बायो-मैथ्स लेकर पढ़ाई की
डॉ. सफलता ने बताया कि बेसिक स्ट्रांग करने के लिए उन्होंने 11 वीं में बायो-मैथ्स सब्जेक्ट सलेक्ट किया।
मेडिकल एंट्रेस में फिजिक्स अक्सर बायो वाले स्टूडेंट के लिए टफ पड़ता है। इसलिए
फिजिक्स और अपनी तार्किक शक्ति बढ़ाने के लिए मैथ्स को साथ लेकर चलना ही ठीक लगा।
पहले अटेम्ट में कुछ नंबरों से चूक गई थी। इसलिए एक साल ड्रॉप लेकर दोबारा तैयारी
की। फाइनली मेडिकल एंट्रेस क्लालिफाई कर लिया। जब ड्रॉप इयर में पढ़ाई कर रही थी
तो महसूस होता था कि कितनी छोटी-छोटी गलतियां एग्जाम में भारी पड़ जाती है।
आते हुए भी कई सवालों के जवाब इसलिए नहीं दे पाई क्योंकि बेसिक क्लीयर नहीं होने
से कन्फ्यूज थी। एक साल की कोचिंग में दिल लगाकर पढ़ाई की। कभी खुद के ऊपर निराशा
को हावी नहीं होने दिया। यही कारण था कि अपनी सफलता को लेकर एक अलग से आत्मविश्वास
पैदा हो गया था।
सचदेवा कोचिंग से मिला मोटिवेशन आज भी है कायम
डॉ. सफलता ने बताया कि साल 2000 में छत्तीसगढ़ नया राज्य बना था। उस वक्त
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए राज्य में बहुत की कम अच्छे कोचिंग संस्थान
हुआ करते थे। इन्हीं में से एक है सचदेवा कॉलेज भिलाई। सचदेवा में मिला मोटिवेशन
मैं आज तक भूल नहीं पाई हूं। यहां के टीचर्स के अंदर एक अलग सा जुनून है बच्चों को
पढ़ाने और उन्हें सफलता के शिखर तक पहुंचाने का। सलेक्टिव स्टडी मटेरियल, शानदार नोट्स और कभी न हार मानने वाले
टीचर्स के बुलंद आवाज को सुनकर बच्चा अपने आप ही पढऩे को तैयार हो जाता है। जब
कभी थोड़ी बहुत निराशा हावी हो जाए तो सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की
मोटिवेशन क्लास अटेंड कर लो। ऐसी एनर्जी भरते हैं कि बच्चा खुद को कभी हारने नहीं
देता है। यहां आने वाले स्टूडेंट के बीच में भी काम्पिटिशन रहता है। जिससे एग्जाम
से पहले ही आपको पढऩे का एक अच्छा माहौल मिल जाता है।
लाइफ में उतार-चढ़ाव आते रहता है बस हार न माने
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट से कहना चाहूंगी कि लाइफ में
उतार-चढ़ाव आते रहता है। कभी किसी को जल्दी सफलता मिल जाती है किसी को लेट से
मिलती है, लेकिन इन सबके बीच में खुद को कभी हारने नहीं देना है। अगर आप
किसी चैप्टर को पढ़ रहे तो उसे तब तक न छोड़े जब तक आप उसके हर पहलू को समझ न जाए।
याद करने से ज्यादा कान्सेप्ट समझना जरूरी है। रिविजन करें और साथ ही साथ अपने
नोट्स खुद बनाए। एग्जाम से ठीक पहले ये नोट्स आपके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं
होते। हमेशा पॉजिटिव रहें। (the states. news)

