- आज देश के सबसे नामी हॉस्पिटल एम्स दिल्ली में हार्ट सर्जन बनकर लोगों को दे रहे डॉ. गैंद नई जिंदगी
- पढि़ए धमतरी जिले के छोटे से गांव से निकलकर कैसे एम्स दिल्ली का हार्ट सर्जन बना सरकारी स्कूल का स्टूडेंट
भिलाई(mediasaheb.com) धमतरी जिले के छोटे से गांव गाड़ाडीह में जन्मे गैंद ने अपने स्कूल में आए एक डॉक्टर से पूछा था कि सर डॉक्टर कैसे बनते हैं। बारबार सवाल के बाद भी जब उस डॉक्टर रूखे अंदाज में कहा कि ये तुम्हारे जैसे गांव के बच्चों के बस की बात नहीं। वो बात नन्हें गैंद के दिल पर लग गई। उसने फैसला किया अब न सिर्फ डॉक्टर बनूंगा बल्कि देश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान में काम भी करूंगा। आज वही मासूम गैंद भारत सरकार के सबसे बड़े मेडिकल इंस्टीट्यूट एम्स दिल्ली में हार्ट सर्जन बनकर लोगों को नई जिंदगी दे रहा है। ये कहानी है बाल मन के उस दृढ़ संकल्प की जिसने विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में भी अपने सपने को टूटने नहीं दिया। किसान पिता के होनहार बेटे ने लगातार तीन साल ड्रॉप लेकर सीजी पीएमटी क्वालिफाई किया। रायपुर मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई के बाद नाम और शोहरत की ऊंचाईयों को छूने वाले डॉ. गैंद सौरभ साहू कहते हैं कि लाइफ में कभी दूसरा ऑप्शन नहीं रखना चाहिए। अगर आप खुद को दूसरा ऑप्शन दोगे तो जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे। इसलिए जो तय किया है उस पर हर परिस्थिति में तब तक खड़े रहो जब तक आप उसे प्राप्त नहीं कर लेते।
अच्छे मेडिकल कॉलेज के लिए लगा दी सीट दाँव पर
डॉ. गैंद ने बताया कि गांव के स्कूल से 12 वीं तक पढ़ाई करके मेडिकल एंट्रेस की तैयारी करना शुरू किया। उस वक्त मेडिकल एंट्रेंस की सभी पुस्तकें अंग्रेंजी में आती थी। ऐसे में हिंदी मीडियम स्टूडेंट होने के कारण शुरूआत में बहुत ज्यादा दिक्कत हुई। पहले अटेम्ट में असफलता हाथ लगी। दूसरे अटेम्ट में मैं बिलासपुर मेडिकल कॉलेज के लिए सलेक्ट हो गया, लेकिन मैं एमबीबीएस रायपुर मेडिकल कॉलेज से पूरी करना चाहता था। इसलिए एमबीबीएस की सीट दाव पर लगाकर खुद को एक और मौका दिया। फाइनली तीसरे अटेम्ट में रायपुर मेडिकल कॉलेज के लिए सलेक्ट हो गया। थर्ड अटेम्ट काफी तनाव भरा रहा। सलेक्शन को छोड़कर एक बार फिर भाग्य आजमा रहा था, ऐसे में काफी डर भी लग रहा था। कड़ी मेहनत से ये अटेम्ट भी क्लीयर हो गया।
फीस भरने के भी नहीं होते थे पैसे तब सहारा बने बड़े भाई
डॉ. गैंद ने बताया कि वे एक कृषक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके घर में बड़े भाई के अलावा किसी ने ग्रेजुएशन तक की भी पढ़ाई नहीं की थी। ऐसे में जब मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू की तो बार-बार पैसों की दिक्कत से सामना होता था। कई बार तो ऐसे हुए कि एंट्रेस एग्जाम के फीस भरने तक के पैसे नहीं होते थे तब बड़े भाई हमेशा एक मागदर्शक और सहारा बनकर हमेशा पीछे खड़े रहे। लोगों से पैसे मांगकर किसी तरह फीस भरते थे ताकि मैं डॉक्टर बन सकूं। मेरी सफलता के लिए परिवार के हर सदस्य ने उतना ही संघर्ष किया है जितना मैंने पढ़ाई के लिए। आज जब अपनी सफलता को देखता हूं तो लगता है कि बिना परिवार और सचदेवा कोचिंग के सहयोग से शायद ही जीवन के इस मुकाम को हासिल कर पाता।
टेस्ट सीरिज में जब फस्र्ट आता तभी चढ़ता था स्टेज पर
डॉ. गैंद ने बताया कि उन्होंने मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज भिलाई को चुना था। सचदेवा में हर सप्ताह एक टेस्ट सीरिज का आयोजन किया जाता है। जब टेस्ट सीरिज में टॉप टेन में आता था तो कभी स्टेज पर नहीं जाता था। मैं इंतजार करता था कि जब फस्र्ट आऊंगा तभी स्टेज पर चढूंगा यही सोचकर दोगुनी मेहनत करता था। चिरंजीव जैन सर ने न सिर्फ मेरी काउंसलिंग की बल्कि जब मैंने मेडिकल की सीट दाँव पर लगाई तब उन्होंने थर्ड अटेम्ट के समय खुद के डर पर काबू पाना भी सिखाया। उन्हें पूरा भरोसा था कि इस बार मैं और अच्छे नंबर से एंट्रेस क्लीयर करूंगा। आज भी जब मैं सचदेवा को देखता हूं तो वहां के टीचर्स उतनी ही शिद्दत से बच्चों को पढ़ाते हुए दिखते हैं जब हमारे दौर में वे पढ़ाते थे।
सुकून मिलता है जब किसी का दर्द कम होता है
डॉक्टर बनना जीवन का मकसद था। एम्स में जब किसी मरीज और खासकर छोटे-छोटे बच्चों को अपनी पढ़ाई और नॉलेज के बल पर नई जिंदगी देते हैं तो खुद के डॉक्टर होने पर गर्व होता है। जो बच्चे इस साल मेडिकल एंट्रेस नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे यही कहूंगा कि पढ़ाई का कोई शॉर्टकट नहीं होता। इसलिए डीप नॉलेज लेने के लिए हमेशा खुद को तैयार करें। बुरे हालातों से डरे नहीं हो सकता है इनसे लड़कर आप अपने जीवन में सफलता की ओर आगे बढ़ रहे हो। इसलिए सवाल करने की बजाय केवल जवाब तलाशकर कड़ी मेहनत करो। कमजोरियों को ताकत बनाकर अपने सपनों को पूरा करो।

