- जिस मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की वहीं एचओडी बनकर कर रहे गरीबों के दिल का इलाज
- पढि़ए गांव के हिंदी मीडियम स्टूडेंट डॉ. कृष्णकांत साहू की सफलता की कहानी
भिलाई(mediasaheb.com) सरकारी हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़कर देश के फेमस हार्ट सर्जन बनकर लगभग 4500 सर्जरी का अनोखा रिकॉर्ड बनाने वाले दुर्ग के डॉ. कृष्णकांत साहू को एक वक्त में अंग्रेेजी ने खूब परेशान किया। इस अंग्रेजी से भागने की जगह उन्होंने ऐसी तरकीब निकाली की अंग्रेजी फिर कभी उनके सफलता के आड़े नहीं आ पाई। ये कहानी है गांव से निकलकर प्रसिद्धि के शिखर तक पहुंचने वाले उस होनहार स्टूडेंट की जिसने जीवन में कभी हार मानना नहीं सीखा। यही कारण है कि आज न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में अपनी अनोखी कार्यशैली के लिए पहचाने जाते हैं। डॉ. साहू ने साल 1995 में एमपी पीएमटी देकर जब रायपुर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया तब कोई नहीं जानता था कि एक दिन यही स्टूडेंट अपने ही मेडिकल कॉलेज के कॉर्डियोलॉजी डिपार्टमेंट का एचओडी बनकर इतिहास रचेगा। 12 वीं में मैथ्स और बायो लेकर एक साथ इंजीनियरिंग और मेडिकल एंट्रेस क्लीयर करने वाले डॉ. साहू कहते हैं कि एक सही फैसला आपकी पूरी जिंदगी बदल सकता है। इसलिए जो लक्ष्य तय किया है उसे हासिल करने तक खुद पर भरोसा रखें एक दिन सफलता आपके कदमों में होगी।
मैथ्स और बायो दोनों ही फेवरेट सब्जेक्ट थे
सरकारी स्कूल से निकलकर सर्जन बनने तक के सफर को यादकर डॉ. साहू कहते हैं कि पहली बार माशिमं ने किसी को दो विषयों में परीक्षा देने की विशेष मंजूरी दी थी। मेरा पसंदीदा विषय गणित था, लेकिन उतना ही मजा बायोलॉजी में आता। जब बारहवीं के नतीजे आए तो मुझे यकीन नहीं हुआ, मैंने बायो में टॉप किया था, जबकि गणित में सेकंड रहा। 12वीं पास करने के बाद मैंने पीईटी की परीक्षा दी। पीएमटी के इम्तिहान में भी शामिल हुआ। पीईटी में सलेक्शन हो गया। पीएमटी में मुझे आयुर्वेद कॉलेज मिल गया। पीईटी के रैंक से इंजीनियरिंग में प्रवेश ले तो लिया, लेकिन दिल में डॉक्टर बनने की धुन सवार थी। उस वक्त खुद पर भरोसे के साथ इंजीनियरिंग छोड़ दी। एक साल का ड्रॉप लेकर दोबारा से पीएमटी की तैयारी में जुट गया। दूसरी बार में पीएमटी के 218 रैंक के साथ रायपुर मेडिकल कॉलेज मिला। क्लास में जाता तो वहां सभी प्रोफेसर अंग्रेजी में पढ़ाया करते थे, और मैं ठहरा हिंदी मीडियम। सारा कुछ ऊपर से निकल जाता था, तब मैंने इसका हल निकाला। हॉस्टल में डिक्शनरी से वड्र्स मिलानकर अंग्रेजी समझता।
केरल का जॉब छोड़कर छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल को चुना सेवा के लिए
रायपुर मेडिकल कॉलेज से ही एमबीबीएस और एमएस तक की पढ़ाई पूरी करने वाले डॉ. साहू ने बताया कि छत्तीसगढ़ में कार्डियो में सुपर स्पेशलिटी का नब्बे की दशक में कोई विकल्प नहीं था, इसलिए जयपुर से स्पेशलाइजेशन पूरा करते ही केरला में नौकरी करने लगा। इस बीच छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में हार्ट सेंटर की कमी बड़ी खलती थी। इसलिए अपनी अगली कर्मभूमि के लिए छत्तीसगढ़ के मेकाहारा अस्पताल को चुना। जब किसी गरीब या जरूरतमंद आदमी के दिल का इलाज करता हूं तो बहुत सुकून मिलता है, क्योंकि जीवन में पैसा ही सबकुछ नहीं होता।
इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों में दिलचस्पी के कारण मैं काफी कंफ्यूज था कि डॉक्टर बनू या इंजीनियर। तब पिता जी ने कहा कि डॉक्टर बनकर समाज की सेवा से बेहतर और कोई नेक काम नहीं हो सकता। इसलिए मैंने एक साल ड्रॉप लेकर भिलाई के सचदेवा कोचिंग में एडमिशन ले लिया। आज जब अपने स्टूडेंट लाइफ को याद करता हूं तो लगता है कि सफलता की पहली सीढ़ी सचदेवा पहुंचकर ही चढ़ गया था। यहां के टीचर्स और डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर ने न सिर्फ ङ्क्षहदी मीडियम स्टूडेंट को मेडिकल कॉलेज के लायक तैयार किया बल्कि जीवन के कुछ ऐसे मूल्य सिखाए जो आज डॉक्टरी के प्रोफेशन में काम आ रहे हैं। जो बच्चे नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे कहूंगा कि खुद को कभी कमतर मत आंको। हर कमजोरी को दूर करने का कोई न कोई तरीका होता है। इसलिए आत्मविश्वास के साथ मेहनत करो। शॉर्टकट की बजाय बेसिक पहले क्लीयर करो। एग्जाम में नॉलेज ही वो पूंजी होती है जो आपको सफलता की ओर ले जाती है। एग्जाम का पैटर्न समझने के लिए पुराने प्रश्न पत्र जरूर साल्व करें।(the states. news)

