साइकिल चलाकर रोज जाते थे कोचिंग पढऩे, आज हैं भिलाई शहर के मशहूर रेडियोलॉजिस्ट
भिलाई(mediasaheb.com) बड़े शहर में एमबीबीएस की पढ़ाई करके महसूस हुआ कि हेल्थ फैसिलिटी में हमारा शहर पिछड़ा हुआ है |इसलिए 15 साल पहले अपने शहर को स्वस्थ बनाने मन में संकल्प लिया और आज छत्तीसगढ़ के नामी रेडियोलॉजिस्ट बनकर लोगों की सेवा कर रहे हैं। ये कहानी है अविभाजित मध्यप्रदेश में अपनी पहचान खोज रहे छत्तीसगढ़ के एजुकेशन हब भिलाई के होनहार स्टूडेंट डॉ. समीर कठाले की। जो न सिर्फ प्रदेश बल्कि देश में भी अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके हैं। डॉ. समीर ने बताया कि उन्होंने बचपन से डॉक्टर बनने का ही सपना देखा था। इसलिए 9 वीं कक्षा से तैयारी शुरू कर दी थी। एमपी बोर्ड होने के बावजूद मेडिकल एंट्रेस के लिए सीबीएसई बोर्ड की किताबों पढ़ते थे। 12 वीं बोर्ड के बाद एक साल ड्रॉप लेकर तैयारी की और साल 2000 में सीबीएसई पीएमटी में सलेक्ट हुए। इस सलेक्शन के साथ ही उन्होंने परिवार के पहले डॉक्टर के रूप में इंदौर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया।
साइकिल से जाते थे कोचिंग, न मोबाइल था और न ही इंटरनेट की सुविधा
डॉ. समीर कठाले ने बताया कि जब डॉक्टर बनने का सपना उन्होंने अपने पैरेंट्स के साथ शेयर किया तो उन्होंने कहा कि तैयारी के लिए एक अच्छे कोचिंग में एडमिशन ले लो। उस समय भिलाई में दो-तीन कोचिंग काफी फेमस हुआ करते थे। जिसमें से एक सचदेवा पीटी कॉलेज भी था। मैं अपने पापा के साथ वहां पहुंचा जब चिरंजीव जैन सर से बात हुई उसके बाद हमने दूसरे कोचिंग की ओर पलटकर ही नहीं देखा। सीधे सचदेवा में ही एडमिशन लेकर पढ़ाई शुरू कर दी। नब्बे के दौर में जब हम कोचिंग जाते थे तो न गाडिय़ों का चलन था और न ही मोबाइल, इंटरनेट की सुविधा। सारे दोस्त साथ मिलकर साइकिल से कई किमी. घूमते-फिरते कोचिंग पहुंचते और वहां मन लगाकर पढ़ाई करते। जब किसी सब्जेक्ट में डाउट होता था तब टीचर्स के अलावा कोई न कोई दोस्त उस डाउट को क्लीयर कर ही देता था। अलग-अलग सब्जेक्ट की पुस्तकें हम एक दूसरे से शेयर भी करते थे।
डॉक्टर से कम कुछ भी मंजूर नहीं था
डॉ. समीर ने बताया कि उन्हें जीवन में डॉक्टर से कम कुछ भी मंजूर नहीं था। नब्बे के दशक में ज्यादा ऑप्शन भी नहीं थे। ऑल इंडिया और स्टेट के अलग-अलग एंट्रेस एग्जाम होने के कारण सीटें भी काफी कम थी। ऐसे में कड़ी मेहनत के अलावा और कोई दूसरा सवाल ही नहीं था मन में। लक्ष्य के अनुरूप सफलता के लिए कोई कमी नहीं छोडऩा चाहता था। इसलिए दिन रात एक करके बस पढ़ाई में ध्यान केंद्रित किया। जिसका नतीजा आज सामने है। घर में पैरेंट्स ने भी पढऩे का माहौल दिया। उनके बिना इतने कम समय में सफलता मिलना काफी मुश्किल था। जब भी मैं निराश हुआ वो हमेशा मुझे मोटिवेट करके आगे बढ़ा देते थे।
आधी जिंदगी हम जैसे बच्चों की जिंदगी संवारने में निकाल दी
डॉ. समीर कठाले ने बताया कि सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज के डायरेक्टर चिरंजीव जैन ने अपनी आधी जिंदगी हम जैसे बच्चों के सपनों को पूरा करने में निकाल दी। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अतुल्यनीय है। आज जब हम सचदेवा में गेस्ट सेशन में तैयारी कर रहे बच्चों के बीच में जाते हैं तो बड़े गर्व से अपनी कहानी शेयर करते हैं। ताकि वे प्रेरणा लेकर अपने सपनों को एक नई उड़ान दे सके। सचदेवा ने नब्बे के दौर से लेकर आज तक अपनी क्वालिटी को मेनटेन किया है। पढ़ाई के साथ जीवन मूल्यों की भी ऐसी शिक्षा दी है जो प्रोफेशन में हर दिन काम आती है।
सीटें और कॉलेज ज्यादा है इसलिए धैर्य से काम लें
नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से बस इतना ही कहना चाहूंगा कि आज से बीस साल पहले और अब के समय में काफी अंतर है। अब न सिर्फ मेडिकल कॉलेज की सीटें भी बढ़ी है बल्कि अपने ही प्रदेश में कई अॅाप्शन भी मिल गए हैं। एग्जाम भी सेंट्रलाइज हो गया है इसलिए धैर्य के साथ मेहनत कीजिए ड्रॉप की चिंता किए बिना बस अपने लक्ष्य पर फोकस रहिए सफलता जरूर मिलेगी। अगर कभी निराशा में आ जाए तो अपने पैरेंट्स से उस बात को शेयर कीजिए, क्योंकि पैरेंट्स से बड़ा मार्गदर्शक कोई नहीं होता।(the states. news)

