रायपुर (mediasaheb.com)| हमारे वेद कहते हैं- सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… अर्थात सब सुखी हों, सब निरोगी हों। वहां कोई वर्ण, जाति, समूह और पक्ष-विपक्ष की बात ही नहीं है। हमारे ऋषि मुनियों ने युगों पहले यह सूत्र दे दिया था – वसुधैव कुटुंबकम् यानी पूरी वसुधा ही हमारा परिवार है। संपूर्ण विश्व के लोगों के सुख और स्वास्थ्य की कामना भारतीय दर्शन का मूल है। न सिर्फ मनुष्य, बल्कि जीव मात्र के हित की इच्छा रखना ही सनातनी परिचय है। मैं राम कथा गाता हूँ। राम राज के मूल में भी ‘सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया’ की ही भावना है। भगवान श्री राम ने सेतु बनाया। आज पूरे विश्व में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सेतु बनाए जाने की आवश्यकता है। जिसमें भी राम तत्व होगा, वह केवल जोड़ने की बात करेगा, तोड़ने की नहीं । सत्य, प्रेम और करुणा प्रमुख राम तत्व हैं। जिसमें ये तत्व होंगे, वह वंचितों तक पहुंचेगा। राम समाज के वंचितलोगों के पास स्वयं चलकर गए। केवट, शबरी, अहिल्या के प्रसंग इसके प्रमाण हैं।
आज समाज की एक बड़ी आवश्यकता है कि सक्षम लोग वंचित लोगों तक, अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों तक स्वयं चल कर पहुंचें। मानस में नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन हुआ है। नौ प्रकार की भक्ति में शबरी के वर्णन में गोस्वामी जी ने सातवीं भक्ति पूरे संसार को ब्रह्ममय मानना-देखना बतायी है- ‘सातवँ सम मोहि मय जग देखा।’ जब हम पूरे संसार को ब्रह्ममय देखेंगे, अनुभूति करेंगे तो किसी के भी दोष दिखाई नहीं देंगे। (स्त्रोत-शाश्वत राष्ट्रबोध)


