- ग्रामीण पृष्ठभूमि, हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़कर किया देश के टॉप 10 में से एक मेडिकल कॉलेज के लिए क्वालिफाई
- बीएससी फस्र्ट इयर पढऩे के बाद शुरू की मेडिकल एंट्रेस की तैयारी, तीसरे अटेम्ट में सीपीएमटी के टॉप 100 में बनाई जगह
भिलाई(mediasaheb.com) मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। इस बात को अपने जीवन की सबसे बड़ी सीख मानकर बालोद जिले के छोटे से गांव डोकला के छात्र ने ऐसी मेहनत की उसकी सफलता इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। जी हां हम बात कर रहे हैं एम्स रायपुर के आई स्पेशलिस्ट डॉ. वेदप्रकाश सिन्हा की। जिन्होंने गांव के हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़कर देश के सबसे कठिन माने जाने वाले ऑल इंडिया पीएमटी 2010 के न सिर्फ टॉप 100 में जगह बनाई बल्कि देश के टॉप 10 में से एक दिल्ली मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की। इनके सफलता का सिलसिला यही नहीं थमा, पीजी में भी बाजी मारते हुए देश के सबसे बड़े मेडिकल इंस्टीट्यूट मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में अपनी सीट पक्की की। डॉ. वेदप्रकाश कहते हैं इस सफलता के पीछे कठिन संघर्ष छिपा हुआ है। एक वक्त ऐसा था जब सही मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण मैंने बीएससी में एडमिशन ले लिया। एक साल तक पढ़ाई भी की लेकिन डॉक्टर बनने का सपना फिर मुझे मेडिकल एंट्रेस की ओर वापस खींच लाया। पहले ही एक साल की देरी और उसके बाद दो साल के ड्रॉप से मन में थोड़ी निराशा आने लगी। एक भरोसा था खुद में कुछ कर दिखाने का, इसलिए तैयारियों में किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी।
मन नहीं लग रहा था बीएससी की पढ़ाई में
डॉ. वेदप्रकाश ने बताया कि 12 वीं बोर्ड के बाद उन्होंने बीएससी में दाखिला ले लिया था, लेकिन वहां पढऩे में मन नहीं लग रहा था। ऐसे में पैरेंट्स को पूरी बात बताई, साथ ही उन्हें भरोसा दिलाया कि मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ूगा। इसी बीच सीपीएमटी की तैयारी के लिए भिलाई आ गया। यहां सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज में एडमिशन ले लिया। शुरू का एक साल तो सब्जेक्ट और एग्जाम के पैटर्न को समझने में ही निकल गया। जब दूसरी बार सीपीएमटी दिया तब मैंने 30 प्रश्न अटेम्ट ही नहीं किया था। उसके बाद भी रैंक 500 के अंदर आ गया। इन तीस प्रश्नों को हल नहीं कर पाने का दु:ख अंदर तक मुझे झकझोरता रहा। इसी बीच तीसरे अटेम्ट से पहले मैंने सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर से बात किया, उन्हें जब पता चला कि 30 सवाल नहीं अटेम्ट करने के बाद भी मेरा रैंक अच्छा आया तब उन्होंने काउंसलिंग करते हुए मुझे गाइड किया। उन्होंने हौसला दिया कि ये तीस प्रश्न अगर तुम तुक्का भी मार देते तो शायद सलेक्ट हो जाते लेकिन इस बात को भूलकर नए सिरे से मेहनत करो। सफलता बहुत पास ही खड़ी होकर तुम्हार इंतजार कर रही। उनकी बातों से इस कदर मोटिवेट हुआ कि टॉप 100 रैंक लाकर एमबीबीएस का सलेक्शन आज तक भूल नहीं पाया हूं।
खुद को बनाया फ्रेंड और खुद से ही सीखते चला गया
डॉ. वेदप्रकाश ने बताया कि जब वे भिलाई पढऩे के लिए आए तो गांव से शहर आने का आकर्षण अलग ही था। सबकुछ नया था। क्लास में कई बड़े स्कूलों और इंग्लिश मीडियम के अच्छे पर्सेंट लाने वाले बच्चे मिले। ऐसे में पूरा ध्यान सिर्फ पढऩे में ही फोकस रहा। यही कारण था कि मेरे ज्यादा दोस्त नहीं बन पाए। मैंने खुद को अपना दोस्त बनाकर अपने अनुभवों और गलतियों से सीखना शुरू किया। जब लगातार दो अटेम्ट में असफल हुआ तब हर बार अपनी गलतियों की समीक्षा करता था। आखिरी अटेम्ट में इन गलतियों को सुधारकर अपना सौ फीसदी दिया। इसलिए मैं ये मानता हूं कि असफलता कभी भी जाया नहीं जाती है ये आपको सीखने की क्षमता देती है।
दोस्त ऐसे बनाओ जो पढ़ाई में डिस्टर्बेंस न बने
नीट की तैयारी कर रहे बच्चों को टिप्स देते हुए डॉ. वेदप्रकाश कहते हैं कि हमेशा हर स्टूडेंट को अपना सपना याद रखना चाहिए। फ्रेंड ऐसे बनाने चाहिए जो आपकी पढ़ाई में कभी डिस्टर्बेंस न बने। क्योंकि आप एक लक्ष्य लेकर चल रहे हो आपके परिवार ने कितने संघर्ष से पढऩे लिए भेजा है। इसलिए शहर की चकाचौंध से दूर रहकर सिर्फ मेहनत करो। जैसे मंदिर में यदि 100 सीढिय़ां चढ़कर ही भगवान के दर्शन हो सकते हैं तो 99 सीढ़ी चढ़ कर दर्शन की अपेक्षा करना खुद के साथ धोखा है। पढ़ाई के साथ-साथ खुद की सेहत पर पूरा ध्यान दें। अच्छे हेल्थ के बिना अच्छे मन-मस्तिष्क की कल्पना नहीं की जा सकती।(the states. news)

