रायपुर (mediasaheb.com) अभिषेक वर्मा ने ट्वीट कर ऑटो इंडस्ट्री में आये बदलावों, समस्याओं और सुधार के तरीकों पर अपने विचार रखें हैं। वे पिछले कई वर्षों से मीडिया के माध्यम से सेल्स, मार्केटिंग एवं मार्केट एनालिसिस के कार्यों से जुड़े हुए हैं, ऑटो इंडस्ट्री पर किसी आर्थिक संकट के आगमन की स्थिति में, अब तक की सभी सत्तासीन सरकारों ने वक्ती तौर पर इंडस्ट्री को आर्थिक मदद दे कर उबारा है। सरकारों की सहायता से इस इंडस्ट्री ने बहुत कम समय में तेज़ी से विकास किया। आर्थिक उदारीकरण के दौर में जनमानस की जेबों में पैसे आये और परिणाम स्वरूप लगभग हर शहरी घर में चार पहिया या दुपहिया वाहन मौजूद है। वैसे ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी ज़्यादातर घरों में वाहन उपलब्ध है। यही वह उदारीकरण का दौर था जब मध्यम वर्गीय परिवारों द्वारा सपनों में देखी जाने वाली गाडियाँ घर के सामने साक्षात रहने लगीं। यह वही दौर था जब बैंकों ने अपनी तिजोरियाँ, नौकरी-पेशा लोगों की वाहन ख़रीदारी के ऋण हेतु खोल दिये। परिणाम सुखद… इंडस्ट्री ख़ुश… आम आदमी अपनी गाड़ियों पर इतराता हुआ और सरकारें अपनी पीठ थपथपाती-मुस्कुराती…
लेकिन इस सारी प्रक्रिया में “दूरदृष्टि” का अत्यंत अभाव था। सवाल जो हर किसी ने उस वक़्त दरकिनार किया वो था- “इससे ऑटो इंडस्ट्री और वातावरण पर भविष्य में क्या उचित-अनुचित प्रभाव पड़ेगा?”
आपको याद होगा दिल्ली का वह फॉग-संकट… जिसके बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने डीज़ल और पेट्रोल गाड़ियों को सीएनजी में बदल देने का सुझाव दिया था और साथ ही दूसरे राज्यों के वाहनों को दिल्ली में प्रतिबंधित कर दिया था।
एक तरफ दिल्ली से निष्काषित वाहनों का बाज़ार और दूसरी तरफ एक्स्चेंज ऑफर के जरिये मिली सेकंड हैंड गाड़ियों की सेल जो वाहन-डीलरों द्वारा ही लगाई जाती हैं। 15-20 साल पुरानी गाड़ियों का अंबार लगा हुआ है सेल में और सड़क पर जो इंडस्ट्री और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है।
तो क्या सरकार इस बार भी तुष्टीकरण का रास्ता अपनाते हुए स्थायी हल की बजाय रफ़ू करेगी? मेरा सुझाव है कि, यह देर से ही सही, मगर समय है एक “स्क्रैप पॉलिसी” का।
इस समय देश में लगभग मोटे तौर पर 35 करोड़ परिवार निवासरत हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर के पहले व बाद में बिके वाहनों को मिला कर इस वक़्त भारतीय सड़कों पर लगभग 25-30 करोड़ वाहन चल रहें हैं। यह संख्या उदाहरण स्वरूप ही लिखी गई है और अगर यह इससे कुछ कम भी है तो 20 साल पुराने भंगार भी सड़कों को रौंद रहें है और पर्यावरण को बराबर नुकसान भी पहुंचा रहें हैं।
“मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण से वाहन इंडस्ट्री में एक सैचुरेशन आ गया है और यहाँ सुधार की गुंजाइश है। इंडस्ट्री की सहायता के लिये एक मज़बूत स्क्रैप पॉलिसी को लाने की ज़रूरत है। जैसे कि विभिन्न वाहनों को 7,10,15, और 20 वर्षों तक ही कोई चला सकता हो। उसके बाद ऑटो कंपनियाँ स्क्रैप के मेटल, टायर, सीट फ़ोम और दूसरे हिस्सों का प्रबंधन कर उसे री-साइकल और री-यूज़ करें। फिर ऑटो कंपनियाँ और फायनेंसर ऐसे ऑफर ला सकते हैं जैसे पुराने वाहन के बदले नया वाहन फ्री… जैसा की मुझे लगता है पिछले बीस सालों से लगभग 25-30 करोड़ वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं मेरे खयाल में वर्तमान जनसंख्या को देखते हुए कुछ 35 करोड़ परिवार देश में निवासरत हैं। अब सोचिये की इंडस्ट्री कहाँ जा रही है। “
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