एमबीबीएस सेकंड इयर में पिता की अचानक मौत के बाद बना लिया था पढ़ाई छोडऩे का मन
भिलाई (media saheb.com) जो ठान लिया वो करके दिखाना है इस बात को जुनून की हद तक जीने वाले डॉ. समर्थ शर्मा आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है। एमडी मेडिसीन के साथ शंकराचार्य मेडिकल कॉलेज भिलाई में असिस्टेंट प्रोफसर के रूप में कार्यरत डॉ. समर्थ के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया जब उनके पैरेंट्स को लोग नसीहत देते थे कि ड्रॉप लेकर बेटा बेवजह अपना साल बर्बाद कर रहा है। काबिलियत पर सवाल उठाते थे। कई रिश्तेदार भी ड्रॉप को लेकर ताने कस देते थे, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी पढ़ाई में लगे रहे है। कहते हैं कि मेहनत के साथ सब्र का फल मीठा होता है, दो साल बाद जब सीपीएटी क्वालिफाई किया तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। डॉ. समर्थ कहते हैं कि अगर मैंने लोगों की बातों पर ध्यान दिया होता तो शायद डॉक्टर बनना तो दूर मेडिकल एंट्रेस भी क्वालिफाई नहीं कर पाता।
बचपन में चाचा को मजाक में कहा था बड़ा होकर बनूंगा डॉक्टर
डॉ. समर्थ ने बताया कि वे धमतरी के बिजनेसमेन फैमिली से ताल्लुक रखते हैं। जब उन्होंने 12 वीं बोर्ड के बाद मेडिकल एंट्रेस की तैयारी और कोचिंग की बात कही तो सबसे ज्यादा सपोर्ट पापा और चाचा ने किया। बचपन में एक दिन चाचा जी ने मुझसे पूछा था कि बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, तब मैंने मजाक में कह दिया था कि एक दिन मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा। आज भी जब उस बात को याद करता हूं तो लगता है कि उस दिन शायद जुबान पर सरस्वती बैठी थी। इसलिए ये मुकाम हासिल कर पाया। मैंने एक साल कोचिंग और दूसरे ड्रॉप में सेल्फ स्टडी की। खुद की तैयारी परखने के लिए टेस्ट सीरिज अटेम्ट करता था। पहली बार घर छोड़कर कोचिंग के लिए भिलाई आया था, ऐसे में एक साल तो माहौल और सिलेबस को समझने में ही निकल गया। फस्र्ट ड्रॉप में कुछ नंबरों से चूका तब लगा कि थोड़ी और तैयारी करके मैं अपना सलेक्शन सुनिश्चित कर सकता हूं कि इसलिए दूसरे ड्रॉप में मन लगाकर पढ़ाई की।
एमबीबीएस सेकंड इयर में हो गई पिता की मौत, तब चाचा ने संभाला
डॉ. समर्थ ने बताया कि सीपीएमटी में अच्छे रैंक के कारण 2005 में उन्हें तमिलनाडु के गर्वमेंट मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिला। वहां का कल्चर और रहन-सहन बिल्कुल अलग था। लैंग्वेज भी समझ में नहीं आती थी तब वहां के टीचर्स ने काफी सपोर्ट किया। मजे की बात थे कि उस मेडिकल कॉलेज में नॉर्थ इंडिया से ताल्लुक रखने वाले पहले बैच को एडमिशन दिया गया था, जिसमें मैं भी शामिल था। शुरूआत का एक साल बहुत अच्छा बीता लेकिन सेकंड इयर में अचानक पिता जी की मौत ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया। दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी और पिता का साया सिर से उठ जाने के गम में पढ़ाई करना ही भूलता जा रहा था। ऐसे मुश्किल वक्त में मेरे चाचा जी ने न सिर्फ परिवार बल्कि मुझे दोबारा अच्छे से पढऩे का हौसला दिया। परिवार को जिम्मेदारियों को देखते हुए एमबीबीएस के बाद मैं दो साल तक जॉब किया उसके बाद पीजी में सलेक्ट हो गया।
सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं जैन सर
सी पीएमटी की तैयारी के लिए जब मैं पहली बार सचदेवा कॉलेज भिलाई पहुंचा तो यहां दूसरे बच्चों को देखकर थोड़ा सहम गया था। चूंकि पहली बार घर से बाहर निकला था पढऩे के लिए ऐसे में चिरंजीव जैन सर ने एक पैरेंट्स की तरह काउंसलिंग करते हुए मुझे पॉजिटिव एनर्जी से भर दिया। उनकी मोटिवेशनल बातें कभी हमें लक्ष्य से भटकने नहीं देती थी। जब भी निराश, उदास या मासूस होते तो बेझिझक उनसे बात कर लिया करते थे। सचदेवा के नोट्स इतने किफायती हैं कि दूसरे साल मैं इन्हीं नोट्स से सेल्फ स्टडी करते रहा। यहां के टेस्ट सीरिज से हमें पता चल जाता था कि कहां तैयारी कम पड़ रही है। टीचर्स बेहद पॉजिटिव माहौल में सारे डाउट क्लीयर करते थे। जो बच्चे इस साल नीट की तैयारी कर रहे हैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि पढ़ाई में डिस्टर्ब बनने वाले स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया से एग्जाम तक दूरी बनाए रखिए। इन्हें यूज करने का काफी समय मिलेगा लेकिन एग्जाम में चूक गए तो फिर एक साल तक इंतजार करना पड़ेगा। अपने लक्ष्य पर फोकस रहकर पढ़ाई करें सफलता जरूर मिलेगी। (the states. news)

