विधानसभा चुनाव के दो साल पहले से ही कांग्रेस और भाजपा जुटी तैयारी में
सीएम भूपेश खुद ही संगठन की रणनीति बनाने में जुटे
भाजपा ने बस्तर जाकर की अगले चुनाव की चिंता
राजनीतिक संवाददाता:-
रायपुर(mediasaheb.com) छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में अभी दो साल से भी ज्यादा वक्त है। इसके बाद भी कांग्रेस और भाजपा में जमीनी स्तर पर चुनाव की तैयारियों के लिए सुगबुगाहट शुरू हो गई है। कांग्रेस में ढाई- ढाई साल के मसले से उपजी परिस्थिति के बाद भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने संगठन के स्तर पर मोर्चा संभालना शुरू कर दिया है। उनके ही नेतृत्व में कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया और आज पार्टी काफी मजबूत है।
कहा तो यह भी जा रहा है कि जल्द ही विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या 70 पार कर जाएगी। दूसरी ओर भाजपा सिमट कर रह गई है, जिसे अभी से विधानसभा चुनाव की चिंता सता रही है। हुए नुकसान की भरपाई कैसे की जा सकती है, इस रणनीति पर विचार करने के लिए बस्तर के दिग्गज नेताओं ने बस्तर जाकर चिंता की।
यह पहली बार हो रहा है, जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को समय से पहले ही गंभीरता से लिया जा रहा है और तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में भूपेश बघेल ने बीते विधानसभा चुनाव से पहले जमीनी स्तर पर काफी काम किया था। इसमें संगठन के निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं से उन्होंने न केवल मुलाकात की, बल्कि पार्टी के पक्ष में काम करने के लिए जोश भी भरा। उसी का ही नतीजा है कि कांग्रेस ने रणनीति के तहत जनता को भाजपा के खिलाफ खड़ा कर दिया और इसे वोटों में तब्दील करने में सफलता पायी।
श्री बघेल उस दौर में जेल जाने से भी नहीं हिचके और ऐसी परिस्थितियों का जमकर मुकाबला किया। मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वाभाविक रूप से श्री बघेल को संगठन से दूर रहना पड़ा। संगठन का नेतृत्व अभी श्री मोहन मरकाम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी श्री बघेल ने संगठन की चिंता करनी शुरू कर दी है। यही कारण है कि वे संगठन की बैठकों में प्राथमिकता से शामिल हो रहे हैं और पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को जनता से जुड़े रहने तथा सक्रिय रहने के टिप्स दे रहे हैं।
बीते दिनों राजीव भवन में हुई बैठकों को श्री बघेल ने उसी तरह संबोधित किया, जैसे वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए करते थे।
पार्टी नेताओं का भी मानना है कि ऐसा होने से आम कार्यकर्ता भी खुद को संगठन व सरकार से जुड़ा हुआ महसूस करता है। सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि सरकार बनने के बाद सत्तारूढ़ दल में असंतोष उभरता है, उससे बचाव हो सकता है। अक्सर कार्यकर्ता सरकार में काम नहीं होने पर संगठन के प्रति उदासीन हो जाते हैं और इसका नुकसान पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ता है। संकेत यही मिल रहे हैं कि श्री बघेल अब लगातार संगठन की ओर ध्यान देंगे और इसके लिए उच्च स्तर पर रणनीति भी बनाई जा रही है।
संगठन स्तर से बूथ स्तर तक की तैयारियों का परीक्षण शुरू कर दिया गया है। हर स्तर पर जिम्मेदार नेताओं को सक्रिय किया जा रहा है, जिससे वे निचले स्तर पर संपर्क में रहें और चुनाव से पहले संगठन पूरी मजबूती से खड़ा रहे।
संगठन में कांग्रेस सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं के प्रचार की भी रणनीति बनाई जा रही है। श्री बघेल ने गांव, किसान, मजदूरों पर विशेष ध्यान दिया है। यही कारण है कि इनसे संबंधित योजनाओं को विशेष प्राथमिकता के साथ लागू किया गया है। संगठन के पदाधिकारियों को इस बात का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि मिल रहे फायदे को प्रचारित करते रहें, जिससे कि लोगों के मन में कांग्रेस के प्रति लगाव बना रहे।
दूसरी ओर भाजपा ने विधानसभा चुनाव में अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए अभी से चिंतन शुरू कर दिया है। पार्टी की सबसे बड़ी चिंता आदिवासी इलाकों का छिन जाना है। माना जाता है कि आदिवासी इलाकों में मिली सीटों के दम पर सरकार बनती है, पिछले चुनाव में भाजपा का लगभग पूरी तरह सफाया हो गया।
जगदलपुर में हुए चिंतन शिविर में पार्टी के नेताओं ने चिंतन तो किया ही, अपनी कमजोरियों पर भी खुल कर बात की। बैठक में एक पूर्व मंत्री ने अपनी बात बेबाकी से रखी, जो चर्चा का विषय बना हुआ है।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा में इसके लिए जिम्मेदारी ठहराए जाने का सिलसिला चला था और इस कारण पार्टी नेताओं के बीच मतभेद भी उभर कर सामने आए थे। यह क्रम अभी तक जारी है। इसे देखते हुए ही पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने शिविर में सीधा संदेश दिया- पिछली बातों को भूल कर चुनाव की तैयारियों में जुटें।
भाजपा नेताओं के बीच इस बात की चर्चा ज्यादा चल रही है कि अब भी पार्टी सरकार के खिलाफ खुल कर हमलावर नहीं हो पा रही है। इस मसले को देखते हुए यह अटकल लगाई जा रही है कि कहीं आदिवासी प्रदेश अध्यक्ष के साथ एक कार्यकारी अध्यक्ष की भी नियुक्ति की जा सकती है।
दरअसल, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ओबीसी वर्ग से हैं और किसान भी हैं, यही बात भाजपा के लिए चिंता का विषय है। पार्टी में ओबीसी कार्ड का काट देखा जा रहा है। दूसरी चुनौती अब किसानों को भाजपा के पाले में लेने को लेकर भी है।
पार्टी चुनाव से पहले ऐसा कोई मंत्र तलाश रही है, जिससे किसान वोट बैंक पर कब्जा किया जा सके। यही वजह है कि भाजपा ने किसानों से संबंधित मुद्दों को लेकर लगातार आंदोलन किया है और सरकार पर हमला बोला है। बीते विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ था कि भाजपा का संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ गया था। इसे ही मजबूत करने की दिशा में पार्टी काम कर रही है। बस्तर में चिंतन शिविर के बाद भाजपा जल्द ही सरगुजा का रूख करेगी। ऐसा कर पार्टी इलाकों के बड़े नेताओं को अभी से सक्रिय करना चाहती है। संघ भी भाजपा की स्थिति से चिंतित है। संघ के प्रतिनिधि लगातार छत्तीसगढ़ का दौरा कर जायजा ले रहे हैं और उनके मार्गदर्शन के अनुसार ही भाजपा की रणनीति बनाई जा रही है।

