इंदौर
जाने-माने जल संरक्षणवादी राजेंद्र सिंह ने दूषित पीने के पानी से हुई मौतों को सिस्टम की बनाई हुई आपदा बताया, और आरोप लगाया कि इस त्रासदी के लिए गहरे तक फैला भ्रष्टाचार जिम्मेदार है. मैगसेसे अवॉर्ड विजेता ने चिंता जताई कि इंदौर जैसे शहर में ऐसा संकट कैसे हो सकता है, जिसे लगातार भारत का सबसे साफ शहर माना जाता है.
'वॉटरमैन ऑफ इंडिया' कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह ने एक न्यूज एजेंसी को बताया, "अगर देश के सबसे साफ शहर में ऐसी त्रासदी हो सकती है, तो इससे पता चलता है कि दूसरे शहरों में पीने के पानी की सप्लाई सिस्टम की हालत कितनी गंभीर होगी."
सरकारी अधिकारियों ने माना कि टॉयलेट से सीवेज का पानी ओवरफ्लो होकर पानी की मेन पाइपलाइन में मिल गया, जिससे उल्टी और दस्त के गंभीर मामले सामने आए.
राजेंद्र सिंह ने दावा किया, "इंदौर में दूषित पीने के पानी का संकट सिस्टम की बनाई हुई आपदा है. पैसे बचाने के लिए ठेकेदार पीने के पानी की पाइपलाइन को ड्रेनेज लाइन के बहुत पास बिछाते हैं."
उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार ने पूरे सिस्टम को बर्बाद कर दिया है. उन्होंने कहा कि इंदौर की घटना इसी भ्रष्ट सिस्टम का सीधा नतीजा है.
सिंह ने कहा, "इंदौर में हर साल गिरता भूजल स्तर सबसे ज्यादा चिंता की बात है. मैं 1992 में पहली बार इंदौर गया था. तब भी मैंने पूछा था कि यह शहर नर्मदा नदी के पानी पर कब तक निर्भर रहेगा?" इंदौर का भूजल स्तर साल-दर-साल खतरनाक ढंग से गिर रहा है, जिसे उन्होंने सबसे बड़ी चुनौती बताया.
ताजा अपडेट के मुताबिक, इंदौर में दूषित पीने के पानी से फैले डायरिया के प्रकोप के बीच फिलहाल 142 लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से 11 ICU में हैं. वहीं, संक्रमण के केंद्र भागीरथपुरा इलाके में 9 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग के दौरान 20 नए मरीज पाए गए.
भागीरथपुरा में चल रहे सर्वे के दौरान स्वास्थ्य टीमों ने 2354 घरों के 9416 लोगों की जांच की, जहां दूषित पानी से आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार छह लोगों की मौत हो गई है और 20 नए मामले सामने आए हैं. प्रकोप के बाद अब तक 398 मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया था. इनमें से 256 मरीज ठीक होने के बाद डिस्चार्ज हो चुके हैं. फिलहाल 142 मरीज अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं, जिनमें से 11 ICU में भर्ती हैं.
नर्मदा लाइन के ऊपर बिछा दी ड्रेनेज, अब उजागर निगम की लापरवाही
भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई गंभीर घटना के बाद अब नगर निगम हरकत में आया है। पिछले दो दिनों से निगम की टीमें गलियों में नर्मदा जल लाइन के लीकेज की जांच कर रही हैं। इसी दौरान निगम की लापरवाही और तथाकथित इंजीनियरिंग व्यवस्था की चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है।
जांच में पाया गया कि क्षेत्र की अधिकांश गलियों में नर्मदा जल सप्लाई लाइन के ठीक ऊपर ड्रेनेज लाइन बिछाई गई है। यही नहीं, ड्रेनेज के चैंबर भी जल लाइन के ऊपर ही बनाए गए हैं, जिससे सीवरेज और पेयजल के मिलने का गंभीर खतरा पैदा हो गया।
नवंबर 2024 से जुड़ी है विवाद की जड़
इस पूरे मामले की जड़ नवंबर 2024 में डाली गई ड्रेनेज योजना से जुड़ी है। उस समय रहवासियों ने स्पष्ट रूप से मांग की थी कि ड्रेनेज लाइन घरों के पीछे मौजूद बैकलेन से बिछाई जाए, जहां पर्याप्त जगह उपलब्ध है। लेकिन क्षेत्र के भाजपा पार्षद कमल वाघेला ने इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया।
पार्षद व रहवासी आमने-सामने आ गए और विवाद इतना बढ़ा कि पार्षद धरने पर बैठ गए। अंततः निगम ने विवाद से बचने के लिए ड्रेनेज लाइन का काम ही रोक दिया, जिसका खामियाजा अब पूरे इलाके को भुगतना पड़ रहा है।
छह महीने से शिकायतें, लेकिन सुनवाई नहीं
क्षेत्र के रहवासी पार्षद के रवैये को लेकर बेहद नाराज हैं। उनका आरोप है कि बीते छह महीनों से वे गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। भागीरथपुरा टंकी पर निगमकर्मी की जगह पार्षद के कार्यकर्ता बैठते थे, जो शिकायत तो दर्ज करते थे, लेकिन जोनल कार्यालय के कर्मचारी शिकायत मिलने से ही इन्कार कर रहे हैं।
रहवासी पुरुषोत्तम यादव का कहना है कि वे कई बार समस्या लेकर पार्षद के घर गए, लेकिन कभी गंभीरता से नहीं सुना गया। अब दूषित पानी से सैकड़ों लोगों के बीमार होने की घटना के बाद निगम और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


