नई दिल्ली.
अमेरिकी द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है. अमेरिका की इस कार्यवाही से दुनिया के ज्यादातर देश खुश नहीं है, लेकिन खुलकर बस कुछ ही देश इसके खिलाफ बोल रहे हैं. वेनेजुएला पर अमेरिका के इस ‘अघोषित नियंत्रण’ के बाद वेनेजुएला के तेल निर्यात पर लगे कड़े प्रतिबंध (Embargo) हटने की उम्मीद जगी है. यदि ऐसा होता है तो क्या भारतीय कंपनियों को सस्ता तेल मिलेगा? ये वो सवाल है जो हर किसी के जेहन में उभर रहा है. कच्चे तेल के व्यापार पर नजर रखने वालों का कहना है कि वेनेजुएला के तेल से प्रतिबंध हटते हैं तो यह भारतीय कंपनियों, रिलायंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी (ONGC) सहित वैश्विक रिफाइनिंग दिग्गजों के लिए ‘लॉटरी’ लगने जैसा होगा. एक सवाल यह भी है कि आखिर यह तेल कंपनियों को कितना सस्ता मिलेगा और वैश्विक बाजार पर इसका क्या असर होगा?
वेनेजुएला वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार (लगभग 300 बिलियन बैरल) पर बैठा है, जो वैश्विक आपूर्ति का लगभग 17-20% हिस्सा है. विडंबना यह है कि कुप्रबंधन और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण नवंबर 2025 तक इसका उत्पादन गिरकर मात्र 9.21 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) रह गया है. यह उस देश के लिए चिंताजनक है जिसने 1970 के दशक में 3.5 मिलियन bpd का उत्पादन किया था. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर 2025 में उत्पादन 1.01 मिलियन bpd था, जो नवंबर में घटकर 8.60 लाख bpd रह गया.
करना होगा बड़ा निवेश
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि यदि प्रतिबंध हटाए जाते हैं तो अमेरिकी तेल कंपनियां वहां के क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को ठीक करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करेंगी. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वेनेजुएला के तेल उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती इसका जर्जर हो चुका बुनियादी ढांचा है. राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के 12 साल के शासनकाल और उससे पहले ह्यूगो चावेज़ के दौर में भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और निवेश की भारी कमी ने इस ‘सोने की खान’ को कबाड़ में बदल दिया है. इस बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए अगले एक दशक तक हर साल कम से कम 10 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी. अगर अमेरिकी कंपनियां इतना बड़ा निवेश करती है और बुनियादी ढांचा खड़ा करती है तो इससे न केवल वेनेजुएला में कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि बाजार में आपूर्ति बढेगी, जिससे कीमतें स्वाभाविक रूप से नीचे आएंगी.
कांटों भरा है रास्ता
भले ही वेनेजुएला में तेल का खजाना बड़ा है, लेकिन उसे निकालने का रास्ता कांटों भरा है. वुड मैकेंजी (Wood Mackenzie) के अनुमान के अनुसार, वेनेजुएला के ओरिनोको बेल्ट में उत्पादन को 2 मिलियन bpd तक ले जाने के लिए कम से कम 1-2 साल और बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता होगी. पूर्ण बहाली के लिए बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण पर $58 बिलियन की लागत आने का अनुमान है. इसमें शेवरॉन, एक्सॉन मोबिल और कोनोकोफिलिप्स जैसी कंपनियों की भूमिका अहम होगी. कोनोकोफिलिप्स जैसी कंपनियों का वहां $10 बिलियन से अधिक का पुराना बकाया है, जिसे वे उत्पादन शुरू होने पर वसूलना चाहेंगी. इसके अलावा एसएलबी (SLB) और हैलीबर्टन जैसी ऑयल सर्विस कंपनियां भी वहां सक्रिय होंगी, जिससे तकनीकी सुधार तेज होगा.
भारतीय कंपनियों के लिए ‘डिस्काउंट’ का गणित
वेनेजुएला का कच्चा तेल अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है. यह मुख्य रूप से ‘हैवी’ और ‘हाई-सल्फर’ क्रूड है. इसी विशिष्टता के कारण यह अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की तुलना में हमेशा सस्ते दाम पर मिलता है. जेफरीज (Jefferies) के विश्लेषण के अनुसार, यदि प्रतिबंध हटते हैं और व्यापार सामान्य होता है तो रिलायंस जैसी कंपनियों को वेनेजुएला का क्रूड ब्रेंट की तुलना में $5 से $8 प्रति बैरल के भारी डिस्काउंट पर मिल सकता है. रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी दुनिया की सबसे जटिल रिफाइनरियों में से एक है, जो इस तरह के भारी कच्चे तेल को संसाधित कर उच्च गुणवत्ता वाला डीजल और पेट्रोल बनाने में सक्षम है. यह डिस्काउंट रिलायंस के ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) को काफी बढ़ावा देगा.
ओएनजीसी (ONGC) की चांदी
भारत की सरकारी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) का वेनेजुएला के सैन क्रिस्टोबल फील्ड में हिस्सा है. प्रतिबंधों के कारण कंपनी का लगभग $500 मिलियन (करीब 4200 करोड़ रुपये) का लाभांश (Dividend) फंसा हुआ है. प्रतिबंध हटने पर न केवल यह बकाया राशि मिलेगी, बल्कि कंपनी को अपने निवेश पर वास्तविक रिटर्न मिलना भी शुरू हो जाएगा.
अमेरिका को सबसे ज्यादा लाभ
वेनेजुएला से बैन हटने का सबसे बड़ा लाभार्थी अमेरिकी गल्फ कोस्ट की रिफाइनरियां होंगी. भौगोलिक रूप से वेनेजुएला अमेरिका के बेहद करीब है, जिससे मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) की तुलना में परिवहन लागत (Freight Cost) बहुत कम आती है. अमेरिकी रिफाइनरीज को वेनेजुएला के हैवी क्रूड से उच्च लाभ मिलता है क्योंकि इसकी लागत कम होती है और यह डीजल, एस्फाल्ट (डामर) जैसे भारी मांग वाले उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त फीडस्टॉक है.
वर्तमान में वेनेजुएला का अधिकांश तेल ‘गुप्त शिपिंग समझौतों’ के जरिए चीन को भारी डिस्काउंट पर बेचा जा रहा है. प्रतिबंध हटने पर यह तेल पारदर्शी तरीके से वैश्विक बाजार में आएगा, जिससे चीन का एकाधिकार खत्म होगा और प्रतिस्पर्धा के कारण कीमतें और भी प्रतिस्पर्धी होंगी.
क्या ब्रेंट $60 से नीचे आएगा?
शॉर्ट-टर्म में, वेनेजुएला में राजनीतिक उथल-पुथल और अमेरिकी नाकेबंदी के कारण आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे कीमतों में हल्का उछाल आ सकता है. दिसंबर 2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों के सख्त प्रवर्तन से निर्यात प्रभावित हुआ, लेकिन वैश्विक बाजार पर इसका असर सीमित रहा क्योंकि फिलहाल दुनिया में तेल की पर्याप्त आपूर्ति है.
लॉन्ग-टर्म एंगल काफी अलग है. यदि ट्रंप के नेतृत्व में वेनेजुएला का उत्पादन 2 मिलियन bpd के पार जाता है, तो बाजार में मौजूद मौजूदा ‘सरप्लस’ (अतिरिक्त आपूर्ति) और बढ़ जाएगी. विश्लेषकों का मानना है कि इस अतिरिक्त आपूर्ति के कारण ब्रेंट क्रूड 2026 में $60 प्रति बैरल से नीचे गिर सकता है. यह भारत सहित उन देशों के लिए राहत की खबर होगी जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं.


