भोपाल
डिजिटल अटॉप्सी ' सेंटर अपनी योजना के अनुसार कामयाब रहा तो यह सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से क्रांतिकारी कदम होगा। इसके तहत बिना चीर-फाड़ किए पोस्टमॉर्टम किया जा सकेगा। इससे शव को सम्मान दिया जा सकेगा और अंतिम समय में लोग अपने प्रियजन के शरीर को बगैर क्षत-विक्षत हुए विदाई दे सकेंगे।
भोपाल जल्द ही देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल हो सकता है, जहां बिना चीरफाड़ के पोस्टमॉर्टम किया जाएगा। जापान और अन्य विकसित देशों की तर्ज पर एम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी शुरू करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया गया है।
एम्स भोपाल प्रबंधन ने भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठक में इसका औपचारिक प्रस्ताव रखा है। खास बात यह है कि इस प्रस्ताव को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से पहले ही सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी थी। अब इसे वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि मंडल के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
सांसद आलोक शर्मा ने कहा कि प्रस्ताव पर रिस्पॉन्स सकारात्मक रहा है और जल्द ही इसके लिए फंड जारी होने की संभावना है। यह परियोजना मंजूर होती है तो एम्स भोपाल मध्यप्रदेश का पहला ऐसा अस्पताल होगा, जहां वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा शुरू होगी। शिलॉन्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि फांसी के मामलों में वर्चुअल ऑटोप्सी और पारंपरिक ऑटोप्सी के नतीजों में 90 प्रतिशत तक समानता रही।
डिजिटल एविडेंस होते हैं तैयार विशेषज्ञों के अनुसार, वर्चुअल ऑटोप्सी से तैयार होने वाली रिपोर्ट डिजिटल साक्ष्य के रूप में बेहद मजबूत होती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति की मौत नस में ब्लॉकेज के कारण हुई है, तो रिपोर्ट में उस नस की 3डी तस्वीर होगी। यह तस्वीर तीन स्तरों में होगी- पहले पूरे शरीर में ब्लॉकेज की स्थिति, फिर संबंधित अंग और अंत में उस खास नस की क्लोज-अप इमेज। इन डिजिटल साक्ष्यों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और अदालत में भी प्रमाण के तौर पर पेश किया जा सकता है।
परिजनों के आक्रोश का नहीं करना होगा सामना कई मामलों में परिजन धार्मिक या सामाजिक कारणों से शव की चीरफाड़ नहीं चाहते। इसे लेकर अस्पतालों में विवाद की स्थिति भी बन जाती है। जिसका सामना कई बार मौजूद डॉक्टरों को करना पड़ता है। पुलिस कानूनी प्रक्रिया के तहत पोस्टमार्टम कराती है, लेकिन इससे परिवार मानसिक रूप से आहत होता है। वर्चुअल ऑटोप्सी इस समस्या का समाधान बन सकती है, क्योंकि इसमें शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए जांच पूरी की जाती है। इससे परिजनों को शव सही अवस्था में सौंपा जा सकेगा।
आधा घंटे में पूरी प्रक्रिया एम्स के फॉरेंसिक विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, जहां पारंपरिक पोस्टमॉर्टम में कई घंटे लग जाते हैं, वहीं वर्चुअल ऑटोप्सी की प्रक्रिया लगभग आधे घंटे में पूरी हो सकती है। यह तकनीक विशेष रूप से ट्रॉमा केस, सड़क हादसों और संक्रामक बीमारियों से जुड़ी मौतों में बेहद उपयोगी मानी जा रही है। कोविड जैसी महामारियों के दौरान यह स्टाफ के लिए संक्रमण के खतरे को भी कम करती है।
देश में 38 वर्चुअल ऑटोप्सी सेंटर बनाने का टारगेट भारत में सबसे पहले 2021 में एम्स दिल्ली में वर्चुअल ऑटोप्सी की शुरुआत हुई थी। अब 2026 की शुरुआत तक देशभर में 38 से अधिक विशेष वर्चुअल ऑटोप्सी लैब स्थापित करने की योजना है। एम्स दिल्ली के अलावा शिलॉन्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस में भी वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा मौजूद है। इसके अलावा एम्स ऋषिकेश में भी यह सेटअप तैयार करने की मंजूरी दी गई है।
कम होगा भार
एक अधिकारी ने बताया कि पारंपरिक तरीके से किए जाने वाले पोस्टमॉर्टम में काफी समय जाता है। इस तरीके से किए जाने वाले पोस्टमॉर्टम रात में नहीं किए जाते हैं। पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल आने वाले 70 प्रतिशत मामले सामान्य मौत के होते हैं। यानी केवल इनकी मौत का कारण पता करना होता है। हालांकि 30 प्रतिशत ऐसे मामले होते हैं, जिनमें कानूनी अड़चनें होती हैं। इस मशीन के जरिए 70 प्रतिशत सामान्य पोस्टमॉर्टम को करने में काफी मदद मिलेगी।
पश्चिमी देशों में इस तकनीकी का बहुत इस्तेमाल किया जाता है। डिजिटल अटॉप्सी के जरिए 30 मिनट के अंदर पोस्टमॉर्टम हो जाता है, जबकि पारंपरिक तरीके से होने वाले पोस्टमॉर्टम में 1-2 घंटे या उससे भी अधिक समय लग सकता है। बता दें कि नायर अस्पताल में सालाना 2000-2500 पोस्टमॉर्टम होते हैं। इनमें से तकरीबन 400 कानूनी मामलों से जुड़े पोस्टमॉर्टम होते हैं।
ऐसे करेगा काम
सामान्य मौत के मामलों में यह वर्चुअल अटॉप्सी मशीन काफी फायदेमंद साबित होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, एमआरआई की तरह इस मशीन में उच्च क्वॉलिटी का स्कैनर लगा होता है। शव को मशीन के अंदर भेजा जाता है, जिससे शरीर के अंदर प्रभावित हुए अंगों के बारे में पता चलता है। स्कैन के जरिए कंप्यूटर पर शरीर के अंदर की चीजों को आसानी से रेडियोलॉजिस्ट और फरेंसिक विशेषज्ञ देखते हैं और मौत के कारणों का पता लग सकता है। दुर्घटनाग्रस्त मामलों या ‘मास कैज्युअलिटी’ के दौरान इस तरह की मशीन से काफी मदद मिल सकती है।


